मंगलवार, 1 सितंबर 2015

पहले नहीं देखा बाबा भोले का ऐसा भक्त जो सिंहेश्वर में लाखों लुटाने आया हो

'जेकर नाथ भोलेनाथ वो अनाथ कैसे होई' की धुन पर मधेपुरा का सिंहेश्वर मंदिर  परिसर उस वक्त झूम उठा जब  मंदिर में  इसी पूर्णिमा के अवसर पर हो रहे जागरण में यह गीत परिसर में गूंजा.
     सावन के पूर्णिमा में इस बार श्रृंगार पूजन कराने आए इस भक्त की बेचैनी  का आलम यह था कि वह भगवान् शिव को मनो सबकुछ समर्पित करने आया हो. सहरसा के  प्रसिद्ध व्यवसायी घनश्याम चौधरी ने बाबा भोले नाथ की पूजा की तो मंदिर परिसर को उन्होंने इस तरह सजवाया कि लोगों का कहना था कि मंदिर इतना खूबसूरत कभी नहीं दिखा था. 
     पर लाखों लुटाने आये घनश्याम चौधरी का श्रृंगार पूजन के बारे में दर्द कुछ अलग हट के था. बताया गया कि यह व्यवसायी सावन में श्रृंगार पूजन करने के लिए कई सालों से अपने क्रम की प्रतीक्षा में था. पर सिंहेश्वर मंदिर के नियमों के अनुसार इनका क्रम सावन में नहीं आ सका. हारकर घनश्याम चौधरी ने सावन की पूर्णिमा को ही बाबा के शरण में आ गए और लाखों लुटा गए साथ ही हाथी गेट की मरम्मत तथा उसे आधुनिक तरीके से बनाने के लिए बीस लाख रूपये दान देने का वादा भी कर गए.
    घनश्याम चौधरी अपनी पत्नी रीना जायसवाल के साथ श्रृंगार पूजा पर  बैठे तो जदयू के बागी विधायक नीरज कुमार सिंह बबलू भी अपनी पत्नी विधान परिषद सदस्य नीतू सिंह के साथ श्रृंगार पुजा में शामिल थे. लोगों का कहना था कि मंदिरों जीर्णोद्धार समेत इसकी भव्यता में ऐसे ही 'गरीब सुदामा' चार चाँद लगा सकते है.

हर गाँव की गलियों में होगी पक्की सड़क: विधायक प्रो० चंद्रशेखर

मुख्यमंत्री सड़क संपर्क योजनान्तर्गत मधेपुरा जिला में सांसद आदर्श ग्राम श्रीपुर बालम गढ़िया में आज राजद विधायक प्रो.चंद्रशेखर ने करोड़ों की लागत से बनने वाली लगभग आधा दर्जन ग्रामीण सडकों का फीता काटकर शिलान्यास किया.
     इस मौके पर आयोजित शिलान्यास कार्यक्रम के दौरान विधायक प्रो. चंद्रशेखर ने कहा कि हर गाँव में  सड़कों का जाल बिछेगा और कोई ऐसा गाँव नहीं होगा जहाँ पक्की सड़क नहीं होगी. विधायक ने नितीश कुमार को विकास पुत्र बताते हुए कहा कि सूबे के मुखिया का जो सपना है उसे हम सब मिलकर पूरा करेंगे.
    वहीँ एक सवाल के जबाब में विधायक ने भाजपा और केन्द्र की मोदी सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि भाजपा और केन्द्र की मोदी सरकार बिहार की जनता को गुमराह कर रही है और झूठे विकास का ढिंढोरा पीट रही है. उन्होंने कहा कि ये पब्लिक है सब जानती है और आगामी चुनाव में भाजपा को जनता मुंहतोड़ जबाब देगी. इसके बाद विधायक ने बालम गढ़िया के भगवती स्थान में एक आम सभा को भी संबोधित किया, जहाँ हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे.
    इस मौके पर कार्यक्रम की अध्यक्षता पंचायत के मुखिया चन्दन कुमार चुनचुन ने किया जहाँ युवा नेता सह प्रवक्ता आलोक कुमार, पंकज कुमार, व्यापार मंडल अध्यक्ष दीपनारायण यादव ,पैक्स अध्यक्ष ललन कुमार,क विलास यादव, जनार्दन यादव, कुमार रिंकू आदि मौजूद थे. उधर सदर प्रखंड के बराही हसनपुर के चुलहाय चौक पर भी चार करोड़ की लागत के एक सड़क का शिलान्यास किया गया.

क्या परवाने नदी की भेंट चढ़ गया कैलाश? एनडीआरएफ की मशक्कत का नतीजा आज शून्य

घंटों मशक्कत के बाद भी आज एनडीआरएफ की टीम कैलाश को नहीं खोज पाई है. मधेपुरा जिले के गम्हरिया प्रखंड के जीवछपुर गाँव के परवाने नदी ने कैलाश को लील लिया होगा. भले ही अधिकांश ग्रामीण कैलाश की मौत डूबने से हो गई है, मानकर चल रहे हैं, पर माँ और पिता की आँखों में अब भी भरोसे की लकीर दिखाई दे रही है, क्योंकि उनके बेटे 17 वर्षीय कैलाश की लाश अबतक नहीं मिल पाई है.
    घटना के बारे में बताया जाता है कि आज दिन में जीवछपुर का कैलाश अपनी भैंस को लेकर परवाने नदी की ओर चराने गया था. घंटों बाद जब उधर से कोई ग्रामीण गुजरा तो उसने देखा कि भैंस किसी दूसरे के खेत में चर रही है और वहां कोई नहीं है. सूचना देने पर कैलाश के पिता और अन्य ग्रामीण जब्कैलाश को खोजने गए तो नदी के किनारे कैलाश के कपड़े पड़े थे और कैलाश का कोई अतापता नहीं था.
    सूचना पर गम्हरिया थानाध्यक्ष रविकांत कुमार, गम्हरिया के अंचलाधिकारी ध्रुव कुमार, सिंहेश्वर के अंचलाधिकारी जय जय राम प्रसाद नदी के किनारे पहुंचे और फिर एनडीआरएफ के चार जवानों को बुलाया गया, पर देर शाम तक कैलाश नहीं मिल सका. शाम का अँधेरा छाने लगा तो अब कल तलाश किये जाने की बात कहकर अधिकारी और ग्रामीण वापस हो लिए हैं.
    पर अधिकांश लोगों का मानना है कि भैंस को धोते समय कैलाश ने अपने कपडे उतारे होंगे और वह गहरे पानी में डूब गया होगा. सच्चाई का पता कल सुबह लगने की उम्मीद की जा सकती है.

बच्चों में भी है हस्त शिल्पकला निर्माण की अद्भुत क्षमता: इन्हें आगे बढाने की है जरूरत

मधेपुरा जिले के बच्चों के हाथों में भी कृतियों को निखारने की कला है. आये दिन विभिन्न स्कूलों में उनके द्वारा बनाये गए कलाकृतियों को सराहा जा रहा है.
     मुरलीगंज  के काशीपुर मोहल्ला स्थित वेल्डन फ्यूचर पब्लिक स्कूल में छात्रों द्वारा आयोजित स्वनिर्मित हस्त शिल्पकला प्रदर्शनी अपने आप में काफी स्तरीय थी. प्रदर्शनी का उद्घाटन करने गई नगर पंचायत की मुख्य पार्षद सर्जना सिद्धी भी बच्चों के द्वारा बनाये गए हस्तशिल्प कला को देखकर दांग रह गई. उन्होंने इस प्रदर्शनी को काफी सराहा तथा कहा कि बढ़ती जनसंख्या और बढ़ते रोजगार के दौर में आने वाले समय मे लोगो को स्वयं रोजगार का सृजन कर बेरोजगारी दूर करनी होगी. और इसमें इस तरह की कला के अच्छे परिणाम देखने को
    स्कूल के निदेशक अशोक कुमार वर्मा ने अतिथियों का स्वागत बुके व माला पहनाकर किया. स्कूल के बच्चों ने विभिन्न स्टॉल लगाकर स्वनिर्मित हस्त शिल्प कला के माध्यम से पर्यावरण, स्मार्ट सीटी, आंतरिक्ष, देश  की सुरक्षा एवं आधुनिक भारत की कई अहम चीजों को दिखाने का प्रयास किया. बच्चो ने स्वरोजगार के लिए विभिन्न तरह की दुकानें खोलकर यह दिखाने का प्रयास किया कि विषम प्रस्थिति मे स्वयं रोजगार कर अपने परिवार को चला सकते है.  मौके पर प्रो.नागेन्द्र प्रसाद यादव, शिक्षक विश्वजीत कुमार, सुमन कुमार, शैलेन्द्र कुमार, सीआरसी पूनम शर्मा, रमेष कुमार, कमलेष कुमार, सुभाक्षी, अनुजा, भारती, प्रज्ञा बाफना, रोहित आनंद आदि मौजूद थे.
    जरूरत है बच्चों की इन प्रतिभा को निखारने की ताकि इनकी प्रतिभा की चर्चा देश स्तर पर हो सके.
(रिपोर्ट: अमित सिंह)

सोमवार, 31 अगस्त 2015

मदरसा शिक्षकों व टोला सेवकों की पुलिस-पिटाई के खिलाफ जन अधिकार पार्टी का धरना

पटना में मदरसा शिक्षकों एवं टोला शिक्षकों की पुलिस द्वारा पिटाई करने के खिलाफ आज मधेपुरा जिला मुख्यालय में जन अधिकार पार्टी के कार्यकर्ताओं ने एक दिवसीय धरना दिया.
    जिला मुख्यालय के कला भवन के सामने आज जन अधिकार पार्टी के संरक्षक सह सांसद पप्पू यादव के आह्वान पर एक दिवसीय धरना की अध्यक्षता प्रो० मोहन ,मंडल ने की.  उन्होंने कहा कि बिहार सरकार बर्बरता की पराकाष्ठा पार कर चुकी है और इस सरकार में अपने हक़ की मांग करने वाले मदरसा शिक्षकों और टोला सेवकों की बेरहमी से पिटाई कर दी जाती है. मौके पर धरना कार्यक्रम में मंच सञ्चालन करते हुए जिला युवा जन अधिकार परिषद् के जिलाध्यक्ष मो० अलाउद्दीन ने कहा कि सरकार ने पूरे सूबे के शिक्षकों को अपमानित करने का काम किया है. जनता चुनाव में उनसे हिसाब लेगी.
    मौके पर डॉ० जवाहर पासवान, राम कुमार यादव, पूर्व मुखिया अजीर बिहारी, राजेश रजनीश, डॉ० अशोक कुमार, अखिलेश यादव, प्रवेश यादव समेतजन अधिकार पार्टी के कई दर्जन नेता व कार्यकर्ता मौजूद थे.

सत्य नारायण झा: उम्दा शिक्षक, सर्वोच्च पुरस्कार: राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित होने से पहले मधेपुरा जिले में जश्न का माहौल

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय |
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय||

गुरु और भगवान दोनों आकर खड़े हो जाएँ तो पहले किसके चरण स्पर्श करें? पहले का समय कुछ और भी हो, पर आधुनिक शिक्षकों को देखकर यह प्रश्न यक्ष प्रश्न लग सकता है. लेकिन आज हम जिस गुरु की चर्चा करने जा रहे हैं उनको देखकर गुरु के चरण-स्पर्श करना ही श्रेष्ठतर है, क्योंकि ऐसे गुरु ही भगवान का रूप होते हैं.
      मधेपुरा जिले ने हाल के इतिहास में ऐसा गुरु नहीं देखा था. एक तरफ जहाँ जिले की शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने में भिड़े कई प्राइमरी स्कूल से लेकर कॉलेज शिक्षकों ने शिक्षण के नाम पर तमाशा किया है वहीं मधेपुरा जिले के गम्हरिया प्रखंड के पारसमणि उच्च विद्यालय से गत 31 मार्च को हेडमास्टर के पद से रिटायर किये शिक्षक सत्यनारायण झा का पूरा जीवन ही प्रेरणादायक है. शायद यही वजह है कि इनके काम और समर्पण को अब भारत के महामहिम राष्ट्रपति ने भी सराहा है और इसी 05 सितम्बर को शिक्षक दिवस पर सत्यनारायण झा भारत में किसी भी शिक्षक को दिया जाने वाले सर्वोच्च सम्मान 'राष्ट्रपति पुरस्कार' से नवाजे जायेंगे.
    जाहिर है ये सिर्फ मधेपुरा ही नहीं बल्कि कोसी समेत पूरे सूबे के लिए गर्व करने का अवसर है. अब जब सत्यनारायण झा राष्ट्रपति पुरस्कार पाने के लिए जा रहे हैं तो अपने साथ अपने गुरु रामशरण भगत को भी ले जा रहे हैं ताकि एन वक्त से पहले अपने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त कर सबसे बड़े सम्मान का हकदार उन्हें भी बना सकें. दिल्ली जाने से पूर्व आज पारसमणि उच्च विद्यालय, बभनी में इन्हें सम्मानित करने के लिए सैंकड़ों ग्रामीणों, शिक्षकों और छात्र-छात्राओं की भीड़ जमी थी.  मौके पर गाँव में बैंड बाजे पर लोग ख़ुशी से झूम रहे थे. जहाँ ऐसे शिक्षक पर प्रखंड गर्व कर रहा था वहीँ कई आँखें नम भी दिखीं.

क्या है शिक्षक सत्यनारायण झा में ख़ास बात?: शिक्षक सत्यनारायण झा में कई बातें ऐसी हैं जो हमें इन्हें जिले के किसी भी शिक्षक से अलग स्थान देने पर विवश करता है. ये न सिर्फ एक उम्दा शिक्षक हैं बल्कि एक उम्दा समाजसेवी भी. गम्हरिया प्रखंड के पारसमणि उच्च विद्यालय, बभनी के प्रधानाध्यापक के रूप में सत्य नारायण झा ने वर्ष 2009 में प्रभार ग्रहण किया था. तब से अब तक श्री झा को कई बार सम्मानित किया जा चुका है. वर्ष 2011 में इन्हें स्कूल की बेहतर व्यवस्था आदि के लिए मधेपुरा के तत्कालीन जिला पदाधिकारी ने सम्मानित किया था और वर्ष 2012 में ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र द्वारा इन्हें पूरे बिहार के लिए अव्वल शिक्षक के रूप में चुना गया. वर्ष 2013 में शिक्षक दिवस पर पुन: जिला प्रशासन द्वारा इन्हें सम्मानित किया गया तो उसी वर्ष गन्हारिया एवं सिंहेश्वर प्रखंड के दलित एवं महादलित प्रकोष्ठ के द्वारा भी इन्हें सम्मानित किया गया. वर्ष 2014 में श्री झा को बिहार सरकार से राजकीय सम्मान मिला तो इस वर्ष इनका नाम राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किया गया और इनके कार्यों से प्रभावित होकर राष्ट्रपति भवन से इन्हें अब राष्ट्रपति पुरस्कार पाने के लिए बुलावा आ चुका है.
       शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने वाले शिक्षक सत्य नारायण झा का नाम एक समाजसेवी के रूप में गम्हरिया प्रखंड में लोकप्रिय है. बताते हैं कि पत्नी के स्वर्गवास हो जाने के बाद श्री झा ने उनके नाम से बभनी गाँव में ही ‘रेणु बाल सुधार केन्द्र’ की स्थापना की और इसने गरीब और दलित बच्चों को मुफ्त सेवा देनी शुरू की. यही नहीं इलाके के लोगों के लिए इन्होने अपनी ओर से चार पहिया वाहन को एम्बुलेंस के रूप में दे दिया है.
    जाहिर सी बात है, जिस जिले में शिक्षक छात्रों की पढ़ाई से अधिक वेतन और ट्यूशन पढ़ाकर अधिक से अधिक रूपये कमाने की चाहत रखते हों, वहां यदि छात्र-छात्रा सत्य नारायण झा को भगवान जैसा मानते हों तो इसमें कहीं से हर्ज नहीं है.

राजनीतिनामा (3): नीतीशजी, जवाब दें हमें...

माननीय नीतीश जी,
हम इस सूबे के युवा हैं और हमने पटना के गांधी मैदान में आपके दल के साथ अन्य दलों के महागठबंधन के द्वारा आयोजित महारैली में आपके भाषण को ध्यान से सुना. हममें से कई युवा पटना के गांधी मैदान नहीं पहुंच सके क्योंकि आपकी पार्टी या फिर आपके समर्थन में खड़ी दूसरी पार्टी हमें वहां नहीं ले गई क्योंकि उन्हें शक था कि हम आपको दगा न दे दें. बावजूद इसके हम लोगों ने आपकी बात टीवी पर सुनी.
माननीय मुख्यमंत्रीजी, आपने भाषण जरूर दिया और गांधी मैदान में आपके भाषण पर जमकर तालियां बजीं लेकिन कुछ सवाल हमारे जेहन में हैं और हम उनके जवाब की तलाश कर रहे हैं। इसके अलावा, और भी कई बातें हैं जो हम इस सूबे के युवा आपसे शेयर करना चाहते हैं.
      माननीय सीएम साहेब, पटना में आयोजित स्वाभिमान रैली में आपकी हताशा साफ झलक रही थी और आपके हावभाव बता रहे थे कि आपने चुनाव से पहले ही हार मान ली है. हमारी धरती चंद्रगुप्त मौर्य की धरती है लेकिन आपके भाषण के जो पुट थे, वे इस बात की तश्दीक कर रहे थे कि जब सेनापति मन से हार मान लेता है तो वह जनता को किस तरह संबोधित करता था और भाषण में किस तरह के विचार प्रदर्शित होते हैं.
     मसलन, आप पटना के गांधी मैदान से सूबे की जनता को संबोधित कर रहे थे। जाहिर सी बात है कि वहां आपके सूबे के लोग यानी हम या हमारे ही परिवार के लोग भारी भीड़ के तौर पर मौजूद थी. या फिर सरकार और मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों और सत्ता पक्ष के विधायकों ने भाड़े पर लोगों को लाकर अपना वर्चस्व दिखाया और आपने देखा है कि लालू यादव ने मंत्रियों को इस रैली की तैयारी के लिए बधाई दी. क्या आपकी पार्टी सहित अन्य दलों के विधायकों और कार्यकर्ताओं का इस रैली को सफल बनाने में कोई योगदान नहीं था?  माननीय, आपको तो मालूम ही होगा कि जो मंत्री, विधायक या कार्यकर्ता अपने क्षेत्र से जितने अधिक लोगों को रैली में लाया, उसका दबदबा पार्टी और आने वाले विधानसभा चुनाव में होगा. हर छुटभैया नेता विधानसभा चुनाव लड़ने और प्रमुख दलों से टिकट पाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाता है. रैली में लोगों को भाड़े पर लाने-ले जाने के ऐवज में पार्टी का टिकट मिलना, यह बिहार की राजनीति का काला सच भी है.
और फिर उन भीड़ के सामने बतौर नेता और सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर आप बिहार के इतिहास की जानकारी दे रहे थे. माननीय, हमें अपना इतिहास पता है और यदि आपको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जवाब देना ही था तो किसी और मंच का इस्तेमाल करते. क्यों जनता के पैसे और समय की बर्बादी की?
नीतीश कुमार जी, आपने अपने भाषण में कहा कि मेरा डीएनए वही है जो बिहार का है. हमारा डीएनए काम करने वाला है, जुबान चलाने वाला नहीं है. आपने कहा कि हम जो कहते हैं, वह करते हैं. हमारे डीएनए को वह चुनौती दे रहे हैं, जिनका देश के स्वाधीनता संग्राम में कोई योगदान नहीं है. आपने कहा कि बिहार चाणक्य, आर्यभट्ट जैसे लोगों की धरती है. जब यूरोप के लोग जंगलों में भटक रहे थे, तब लोग नालंदा और विक्रमशिला में ज्ञान प्राप्त करने आते थे.
       माननीय मुख्यमंत्रीजी, कम से कम ऐसी बातों और इतिहास के पन्नों पर आप तो गर्व न करें तो अच्छा. सच कहें तो गांधी मैदान के मंच पर तो आपकी बदजुबानी चल रही थी. जनता के साथ स्वाभिमान की उन बातों को भी शेयर करनी चाहिए थी जिसमें आपका योगदान रहा हो. आप और आपके सहयोगी लालू यादव तो पिछले 25 वर्षों से बिहार पर राज कर रहे हैं और 25 वर्ष का समय किसी सूबे के लिए कम नहीं होता. आखिर आप और लालू दोनों तो जयप्रकाश नारायण (जेपी) के सानिध्य में राजनीति का ककहरा सीखा था. वहीं, आपके बौद्धिक गुरु राममनोहर लोहिया ने कहा भी था कि जिंदा कौम पांच साल तक इंतजार नहीं करती लेकिन बिहार के लोगों में धैर्य इतना था कि उन्होंने पांच नहीं पांच गुना यानी 25 वर्षों तक इंतजार किया और काम करने की पूरी छूट दी. बावजूद इसके न तो आप और आपके सहयोगी लालू यादव ने ऐसा कोई काम किया, जिसका नाम लेकर आप गांधी मैदान में आप गर्व करते. कम से कम मंच से यह बात तो बता देते कि आपके किस काम के लिए आने वाली पीढ़ी आपके मुख्यमंत्री काल को याद करती और हजारों वर्षों बाद गांधी मैदान के मंच से आपके जैसा कोई नेता कहता कि मेरा डीएनए वही है जो इस राज्य का है और जो लालू और नीतीश जैसे नेताओं का था. पूरे 25 वर्षों में यदि आप दोनों ने मिलकर यदि एक भी ऐसा काम किया होता तो उसकी मार्केटिंग करने से आप दोनों नहीं चूकते, यह हम युवा जानते हैं.
       माननीय नीतीश जी, हम युवा हैं और हमलोगों की पीढ़ी इस बात पर गर्व नहीं करती है हमारे पूर्वज क्या थे या फिर उन्होंने क्या काम किया था या फिर हमारा जन्म किस परिवार में हुआ था. हमें जाति-पाति से भी मतलब नहीं है. पिछले 25 वर्षों में हम इतने जागरूक हो चुके हैं कि हमें क्या करना है, हमें पता है. आप देख रहे हैं न कि गुजरात में ओबीसी को आरक्षण दिलाने के लिए हार्दिक पटेल ने कितनी बड़ी रैली की और वह राज्य किस तरह सुलग रहा है. आज हमारा हीरो हार्दिक पटेल है साहब. हमारा हीरो अरविंद केजरीवाल है, जिसने चाह लिया तो कांग्रेस के छक्के छुड़ा दिए. आपको तो केजरीवाल का भी समर्थन प्राप्त है और आप तो हमसे अधिक उन्हें जानते होंगे तो बताएं कि क्या उनका परिवार देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ा था. इतना ही नहीं, अरविंद केजरीवाल ने तो केंद्र सरकार के खिलाफ मुख्यमंत्री पद पर रहते अनशन किया और अपनी मांगों को लेकर केंद्र सरकार के नाकों में दम किए रहते हैं लेकिन पिछले 25 वर्षों में आप और लालू यादव ने कितनी बार बिहार को लेकर नाकों दम किया, इसका आंकड़ा क्या आप दे सकते हैं? बड़े स्वाभिमान के साथ आप कहते हैं कि केंद्र ने जो पैकेज दिया, उस पर तो हमारा हक था. चलिए, यदि आपकी बात में सच्चाई है तो आपने मोदी से पहले बिहार की जनता को यह बात क्यों नहीं बताई कि सरकार के पास कितना पैकेज बकाया है. आपने मोदी के भाषण से पहले क्यों नहीं जनता जनार्दन को बताया कि केंद्र सरकार उनके पैसे रिलीज नहीं कर रही है और फिर केंद्र में भाजपा सरकार बने एक वर्ष से अधिक हो गए हैं. अब जब मोदी ने वाहवाही लूटी तो आप सफाई दे रहे हैं.
महोदय, हम तो इस बात पर यकीन करते हैं कि हम क्या काम कर रहे हैं और हम नई पीढ़ी को क्या दे रहे हैं. हम अपने हाथों की श्रम शक्ति को समझते हैं न कि किसी की दया पर जीते हैं. आज इंटरनेट की दुनिया है. गूगल, फेसबुक और ट्विटर की दुनिया है. आज मोबाइल और स्मार्टफोन की दुनिया है और आपको मालूम ही होगा कि इसका निर्माण किसी वैज्ञानिक के बेटे ने नहीं किया है और न ही इनका निर्माण करने वाले आपकी जैसी सोच रखते हैं. इनका निर्माण करने वाले सभी हम जैसे युवा हैं और खेल-खेल में दुनिया के हाथों में ऐसा औजार थमा दिया, जिसकी मुरीद आप भी हैं.
      माननीय नीतीशजी, आप और आपके तमाम साथी अभी तक सोशल जस्टिस की बड़ी-बड़ी बातें करते थे लेकिन इस बात को आप उस वक्त क्यों भूल गए जब आपने कहा कि हमारे डीएनए को वह चुनौती दे रहे हैं, जिनका देश के स्वाधीनता संग्राम में कोई योगदान नहीं है. मुख्यमंत्रीजी, हम युवाओं ने भले ही सुना कि हमारे दादा-परदादा स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था या फिर हमारे गांव से कोई अंग्रेजों के डर से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया तो हम युवा आपसे जानना चाहते हैं कि क्या हमारी हैसियत अभी भी आपकी नजरों में दोयम दर्जे की है. हम युवा हैं और हम धर्म, जाति सहित तमाम भेदभाव सब भूलकर सूबे, देश और दुनिया के लिए मिलकर कुछ करना चाहते हैं. लेकिन आप हैं कि हमारे पूर्वजों ने ‘यह क्या’, ‘वह क्या’ जैसे जुमले कहकर हमारे उत्साह को कम कर रहे हैं और हमारे अस्तित्व और कार्यशैली को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं. हम युवाओं की दुनियां है और आप लोग आउटडेटेड हो चुके हैं. हमें भीख नहीं अपना अधिकार चाहिए. हमें स्वराज चाहिए.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

रविवार, 30 अगस्त 2015

सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रोकने के लिए बना COTPA कानून मधेपुरा में असरहीन

 सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान भले ही प्रतिबंधित हो गया है पर मधेपुरा में अभी भी इसके लिए बने कानून को सही तरीके से लागू होने में काफी वक्त लग सकता है. वैसे भी इस तरह के कानूनों को लागू करवाना कहीं भी प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. क्योंकि इससे सम्बंधित कानून ‘कोटपा’ को जब भी आम नागरिक तोड़ेंगे तो हर जगह पुलिस खड़ी नहीं रहेगी.
    मधेपुरा में सार्वजनिक स्थल पर धूम्रपान सामान्य सी बात है. दरअसल ऐसा भी है कि इसपर प्रतिबन्ध से सम्बंधित कानून की लोगों की सही जानकारी भी नहीं है. जिला प्रशासन भी आमलोगों को कानून की जानकारी देने में असफल रहा है. शराबखोरी और तम्बाकू उत्पादों सहित अन्य तरह के धूम्रपान के खिलाफ दशकों से मधेपुरा समेत बिहार में सबसे सफल अभियान चलने वाले मधेपुरा के गंगा  दास कहते हैं कि जिले में उन्होंने सिर्फ समाहरणालय परिसर में धूम्रपान पर रोक सम्बंधित एक बोर्ड देखा है और इसके अलावे कहीं भी प्रशासन के द्वारा कोई प्रयास उनकी नजर में नहीं है.
    श्री दास भारतीय तम्बाकू नियंत्रण कानून (COTPA) की जानकारी देते हुए बताते हैं कि इस कानून की धारा 4के मुताबिक सार्वजनिक स्थानों, जैसे सरकारी भवन, सार्वजनिक परिवहन, होटल, रेस्टोरेंट, पार्क, अस्पताल, विद्यालय इत्यादि पर धूम्रपान निषेध है और इसके उल्लंघन पर 200 रूपये तक के जुर्माने का प्रावधान है. इसके अलावे COTPA की धारा में तम्बाकू उत्पादों के विज्ञापनों पर प्रतिबन्ध, धारा 6 में नाबालिगों द्वारा तम्बाकू उत्पाद बेचा जाना या किसी भी शिक्षण संस्थानों के 100 गज के दायरे में तम्बाकू बेचने पर प्रतिबन्ध पर जुर्माना आदि की भी बात है, पर इसका सही ढंग से पालन नहीं हो रहा है.
    जबकि मधेपुरा के थानाध्यक्ष मनीष कुमार बताते हैं कि कोटपा के कानून को लागू कराने में मधेपुरा पुलिस गंभीर है और हाल में भी सार्वजनकि स्थान पर धूम्रपान करते कई लोगों को अर्थदंड से दण्डित किया गया है. (वि.सं.)

गठबंधन ने किया स्वाभिमान रैली के ऐतिहासिक होने का दावा: विपक्षियों ने कहा 'फ्लॉप शो'

पटना में आज महागठबंधन की ओर से आयोजित 'स्वाभिमान रैली' को महागठबंधन के नेताओं ने अभूतपूर्व एवं ऐतिहासिक बताया. उनका कहना है कि इस रैली में उमड़ी भीड़ ने साबित कर दिया कि बिहार की भाजपा गठबंधन की एक नहीं चलने वाली है.
    स्वाभिमान रैली की समाप्ति के बाद राजद के प्रदेश महासचिव ई. प्रभाष कुमार यादव ने मधेपुरा टाइम्स को बताया कि आज की रैली गांधी मैदान में पूर्व में आयोजित किसी भी रैली की तुलना में विशाल थी. लोगों की भीड़ जितनी मैदान में थी, उससे दुगुना छज्जूबाग तथा आसपास की सड़कों पर थी. प्रदेश महासचिव ने दावा किया कि आज सोनिया, लालू, शरद और नीतीश ने मोदी के कारनामों की पोल खोल दी और उपस्थित जनसमूह ने हाथ उठाकर उनकी बातों को समर्थन दिया. इस रैली ने यह साफ़ कर दिया है कि भाजपा गठबंधन का का पत्ता इस बार विधानसभा चुनाव में बिहार से साफ़ हो जाएगा.
    उधर दूसरी तरफ भाजपा, जन अधिकार पार्टी समेत महागठबंधन की विपक्षी पार्टियों ने आज की स्वाभिमान रैली को फ्लॉप शो करार दिया है. (नि.सं.)

अवैध शराब का कारोबार: स्प्रिट, देशी शराब, खाली बोतलों के साथ शराब माफिया धराया

छापेमारी कर  मधेपुरा जिले की सिंहेश्वर  पुलिस ने  135  लीटर  स्प्रिट के साथ साथ 30  बोतल, 400 एमएल देशी शराब और 40  खाली बोतल के  साथ  शराब  के माफिया को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.
    जानकारी के अनुसार  सिंहेश्वर पुलिस को गुप्त सूचना मिली कि  भवानीपुर  मे  नकली  शराब बनाने का  अवैध कारोबार  चल रहा है. गुप्त सूचना के आधार पर सिंहेश्वर प्रखंड के भवानीपुर  पंचायत के  वार्ड नंबर  4 में थाना  अध्यक्ष राजेश कुमार  के  नेतृत्व में  सअनि अनिल कुमार सिंह,  गुप्तेश्वर प्रसाद,  हवलदार  राधेश्याम  पांडे,  सिपाही  तरूण  कुमार,  मौलेश  कुमार,  रंजय  कुमार  यादव, नवीन  रजक के साथ  पुलिस  टीम ने  छापेमारी कर  शराब  माफिया  दीनबंधु  सिंह  के साथ  5 गैलन शराब  (135  लीटर ), 400  एमएल के  बोतल और पैकिंग के लिए कई खाली बोतल भी बरामद कर लिया.
   जानकारी  हो कि  2011 में भी  शराब के  अवैध  कारखाना  चलाने के  आरोप में  कांड संख्या  116 /11 दर्ज किया गया था, जिसमे  शराब  बनाने  एवं  शराब  पेक  करने का मशीन भी पकडाया था. मामले में सिंहेश्वर थाना कांड संख्या  145 /15 दर्ज  करते हुए  अभियुक्त को  जेल भेज दिया गया है.

शनिवार, 29 अगस्त 2015

राजनीतिनामा (2): मूर्ख बना भोगते हैं सत्ता का सुख

राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता और कोई दगा भी नहीं होता. यही कारण है कि जिस कांग्रेस को हटाकर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने, वही अरविंद केजरीवाल बिहार और दिल्ली के मंच पर नीतीश के साथ मंच साझा कर रहे हैं. मालूम हो कि बिहार में नीतीश कुमार के साथ लालू यादव खड़े हैं और उनकी पार्टी राजद को कांग्रेस का साथ है. एक ओर जहां दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल कांग्रेस पार्टी और शीला दीक्षित की सरकार को कोसते नजर आ रहे थे, वहीं बिहार की कांग्रेस पार्टी पर चुप्पी साध रखी है. राजनीति में चुप्पी भी बड़े काम की चीज होती है, जिसे अरविंद बखूबी जानते हैं. एक स्थान पर दुश्मन और दूसरे स्थान पर दोस्त, यह राजनीति की चालें हैं, जिसे मतदाताओं को समझना आवश्यक है, नहीं तो ये राजनेता भोले-भाले मतदाताओं को मूर्ख बनाते रहेंगे.
            यह पहली बार नहीं है जब राजनीति में एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी रहे नेता एक साथ आए हैं. याद होगा कि बिहार में कांग्रेस को हटाकर जनता दल की सरकार आई थी. हालांकि बिहार की राजनीति में लालू यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद व्यापक परिवर्तन आए और सामाजिक तौर पर लोग अपने हक के लिए जगे. लेकिन इसके लिए प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के द्वारा मंडल आयोग लागू किया जाना जिम्मेदार रहा और इसका भरपूर फायदा लालू यादव ने उठाया. बिहार में जनता दल ने कांग्रेस को हराया था और लालू वहां की सत्ता हासिल की थी. सत्ता हासिल क्या की थी, केंद्र में मौजूद जनता दल सरकार ने उन्हें दिल्ली से बिहार भेजकर मुख्यमंत्री का पद बतौर गिफ्ट दिया था. शुरुआती दौर में उन्होंने राजधानी पटना का जिस तरह कायाकल्प किया और अपनी पहचान कायम की, सफलता हासिल की, यह कहानी विरले ही भारतीय राजनीति में देखने को मिलती है. बदलते वक्त के साथ लालू यादव भी बदले और उनकी राजनीति भी. जिस कांग्रेस को हटाकर वह सत्तारूढ़ हुए थे, उसी पार्टी के सहयोग से अगली बार बिहार से सरकार बनाई. फिर जब उन्होंने सत्ता पर काबिज रहने के लिए अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया तो उनके तमाम सहयोगी विपक्ष में जा बैठे. फिर उन्हें हराने के लिए जेडीयू और बीजेपी ने गठबंधन किया और विधानसभा चुनाव में जीत होने पर दिल्ली ने फिर अपना इतिहास दोहराया और वहां के चुने गए विधायकों पर नीतीश कुमार को नेता के तौर पर थोप दिया गया. फिर नीतीश ने राजनीति में क्या-क्या चालें चलीं, यह किसी से छुपी हुई नहीं है. जिस पार्टी को हराने के लिए लोगों से वोट मांगा फिर उसी के साथ कंधा मिला लिया। नेता को सिर्फ दावा ही करते हैं और फिर नीतीश भी किसी से कम क्यों रहें?
         जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगने वाले और सत्ता हासिल करने के बाद अपने विधानसभा या लोकसभा को भूलने वाले ये नेता भाई-भतीजावाद का क्या खेल खेलते हैं, यह बिहार के मतदाताओं को बखूबी समझनी चाहिए. जब तक बिहार के मतदाता इन राजनेताओं की गंदी चालों को नहीं समझेंगे, तब तक राजनेता आमलोगों को मूर्ख बनाते रहेंगे और सत्ता का भोग भोगते रहेंगे. जरा याद करें, विधानसभा और लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले या हारने वाले बड़े नेताओं को, जिनकी तूती पूरे देश में बोलती थी और है. कभी वक्त ऐसा भी था, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में सबसे अधिक प्रतिनिधित्व बिहार का होता था लेकिन विकास के नाम पर इन्होंने सदैव अपने मतदाताओं के साथ मजाक किया है. मसलन, मधेपुरा को ही लें. यहीं की मिट्टी में वीपी मंडल जैसे नेता पैदा हुए जिनकी रिपोर्ट ने देश की दशा और दिशा बदलकर रख दी. यहां की मिट्टी से भले ही लालू यादव और शरद यादव पैदा न हुए हों लेकिन यहीं से जीतकर संसद का मुंह देखा है. राष्ट्रीय नेता के तौर पर इन दोनों नेताओं ने जो भी काम किया हो, शरद यादव को बेहतर सांसद होने का पुरस्कार भी मिला हो लेकिन इन दोनों ने अपने संसदीय क्षेत्र को बेहतर संसदीय क्षेत्र के तौर पर राष्ट्रीय पटल पर उभार नहीं पाए. आज भी यह क्षेत्र विकास से किस तरह कोसों दूर है, किसी से छुपी नहीं है. दोनों नेता गाहे-बगाहे संसदीय क्षेत्र का दौरा भी करते हैं लेकिन शर्म उनको मगर आती नहीं. छोटी-छोटी उपलब्धियों को यहां की जनता के बीच बड़ा बनाकर ऐसे पेश करते हैं, जैसे उनसे बेहतर उनका प्रतिनिधि कोई हो ही नहीं सकता है. पूरे इलाके के लोग इतने सीधे और शांत हैं कि वे उनकी लोकलुभावन बातों में आ जाते हैं और उन्हें आंखें मूंद कर वोट देते हैं और उनके नाम पर मर-मिटने के लिए तैयार रहते हैं.
        स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व और बाद के कई दशकों तक केंद्रीय राजनीति में यहां के नेताओं का दखल होता रहा है लेकिन बदलते वक्त के साथ यहां के नेता सिर्फ सीटों की संख्या के मामले में दुधारू गाय के रूप में तब्दील हो गए हैं. यहां के नेता समाज, परिवार के साथ-साथ एक-एक व्यक्ति के बीच फूट डालकर राज करने में माहिर हो गए हैं. अंग्रेज तो इस देश से चले गए लेकिन फूट डालो और राज करो की नीति यहां के नेताओं की नसों में घुसेड़ गए. इसका परिणाम यह हुआ कि यहां की राजनीति इस तरह कलुषित होती गई कि जाति और धर्म के नाम पर वोट डाला जाने लगा.
        बिहार में बदलाव तब तक नहीं हो सकता है जब तक यहां के लोग राजनेताओं की कठपुतली बने रहेंगे. राष्ट्रीय नेताओं की गंदी चालों को समझना होगा. बातों के जरिए हंसाने वाला सिर्फ हंसा कर फंसा सकता है, काम नहीं आ सकता, इस बात को समझना होगा. भले ही यहां की राजनीति जातिवाद पर अभी तक चलती आ रही है लेकिन सूबे के तमाम दलों के नेताओं ने यहां के लोगों के साथ किस तरह धोखा दिया है या भ्रमित किया है, यह जानना आवश्यक है. समय आ गया है कि अब राजनीति करने वाले नेताओं से हिसाब लिया जाना चाहिए और पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने क्या किया है. विकास की बात करते हैं तो ये नेता बताएं कि पूरे सूबे से पलायन क्यों नहीं रूक रहा है या फिर ऐसी स्थिति क्यों नहीं बन रही है कि दूसरे राज्यों से श्रमिक बिहार में काम करने आएं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

वादे हैं वादों का क्या?: चौसा के बिजलीरहित ग्रामीणों ने कहा 'बिजली नहीं तो वोट नहीं'

 "जो उलझ कर रह गई 
है फाइलों के जाल में
गाँव तक वो रोशनी 

आएगी कितने साल में"
सूबे के मुखिया नीतीश कुमार ने चौसा में वादा किया था कि 2014 तक हर गाँव में बिजली पहुंचा दूंगा. पर वादे हैं  वादों का क्या? चौसा प्रखंड के दर्जनों गाँव आज बिजली से मरहूम हैं. मुख्यमंत्री के वाडे के मुताबिक 2014 क्या, 2015 भी जाने को है और आज तक कई गाँव के  लोगों को बिजली महारानी के दर्शन  तक नहीं हुए हैं.
        पर अब जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है इन गांवों के लोगों में सरकार के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा  है. आज चौसा पूर्वी पंचायत के अभिया टोला बसैठा के सैंकड़ों ग्रामीणों ने आखिर यह आह्वान कर दिया कि इस बार यदि बिजली और सड़क नहीं तो वोट नहीं.

क्यों है इतना आक्रोश?: ग्रामीण शम्भू मंडल,गोपाल मंडल,घनश्याम मंडल समेत कई दर्जन ग्रामीणों ने बताया कि वर्ष 2006 में हम 63 ग्रामीणो ने बिजली कनेक्शन के लिए रूपये जमा किये और 2009 में हम लोगों को बिजली कनेक्शन का रशीद भी दिया गया. उम्मीद की रोशनी दिखाई दी कि अब हमारे घर में बिजली आएगी, पर 6 वर्षों के बीत जाने  के बाद भी आज तक सरकार के द्वारा रौशनी नहीं पहुंचाई गई. यही नहीं, हमारे घर के सामने से गुजरने वाला सड़क भी पोरी तरह जर्जर हो चुका है. इस सड़क से भागलपुर, पुर्णियां, कटिहार आदि दर्जनों गाड़ी गुजरती है पर सड़क का हाल इतना बुरा है कि पता ही नहीं चलता है कि सड़क में गड्ढा है या गड्ढे में सड़क. ग्रामीणों ने कहा कि यहाँ के विधायक और बिहार सरकार के मंत्री नरेंद्र नारायण यादव सिर्फ भाषण में कहते हैं कि यह सड़क पास हो चुका है, जल्द ही कम चालू हो जायेगा.
       हाल बुरा चौसा प्रखंड के अन्य कई गांवों का भी है. चिरौरी पंचायत के चिरौरी, भवनपुरा बासा में भी लोग आठ साल पहले बिजली के उपभोक्ता बना गए पर इन गांवों में बिजली के तार तक नहीं पहुंचे है. बिजली कंजूमर लोग वोट बहिष्कार का मन बना रहे है.
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