सक्सेस स्टोरी (5): कर्म को भगवान मानने वाले इस हीरो के पीछे भी है एक हीरो जिसने अपने घर-मकान को गिरवी रख कर की थी अशफाक की मदद: आसान नहीं था बाथरूम साइज के दुकान से भव्य शोरूम तक का सफ़र (अंतिम भाग)

(गतांक से आगे.....)
अनुभवी और बुजुर्गों का कहना है कि जब आप थोड़ा ऊपर चढ़ेंगे और मदद की आवश्यकता होगी तो कुछ लोग आगे आ सकते हैं. पर जब आप बहुत आगे बढ़ने लगेंगे तो कल तक मदद करने वाले भी खुद को अलग करेंगे क्योंकि आपकी असीमित सफलता लोगों में जलन पैदा करती है.

सीढ़ी-दर-सीढ़ी संघर्ष रहा कांटो भरा
: वर्ष 2001 के अंत में मधेपुरा के कुछ लोगों ने भले ही कमोबेश इनकी आर्थिक मदद की हो पर फिर भी अशफाक को माँ के गहने मुरलीगंज में गिरवी रखकर 26 हजार रूपये दूकान में लगाने पड़े. माँ के गहने गिरवी रखने की बात कहते अशफाक के चेहरे पर मायूसी दिखती है और कहते हैं कि कुछ ही साल में धनराज सुराना जी के ब्याज गहने के मूल्य से अधिक हो गए तो गहने छोड़ देने में ही भलाई समझी. हालाँकि जब आर्थिक स्थिति सुधरी तो माँ को अधिक गहने खरीद कर उन्होंने दे दिए. जिला परिषद् की दुकान छोटी सी बाथरूम की तरह महज 8X8 फीट की थी और उस समय महीने में दो-तीन मोटरसायकिल बिक जाया करती थी. वर्ष 2003 में एडीबी के बगल में रितेश झा की दुकान भाड़े पर लिया और बैंक ने अबतक सीसी (कैश क्रेडिट) बढ़ाकर चार लाख कर दी. दिन-रात एक कर मेहनत करने लगे तो मेहनत रंग भी लाई और 2005 में हीरो होंडा ने अच्छे काम के लिए पुरस्कृत किया और ऑथोराईज्ड सर्विस सेंटर देने का ऑफर कर दिया. पर इसके लिए बीस-पच्चीस लाख रूपये मैनेज करना संभव नहीं था. पर अशफाक ऐसे वक्त में दो लोगों को याद करते कहते हैं कि बैंक अधिकारी संतोष कुमार झा ने मार्गदर्शन किया और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चीफ मैनेजर और जोनल मैनेजर से बात की, पर बैंक बिना Mortgage के तैयार थी नहीं और अशफाक के पास इसके लिए चल-अचल संपत्ति लाना मुश्किल था.

मरूस्थल में पानी की बूँद बनकर सामने आए दिनेश: अशफाक न भूलने वाले इस सख्स के एहसान को याद करते कहते हैं कि ऐसे वक्त में मधेपुरा के ही पहले डीटीओ ऑफिस में काम करने वाले दिनेश रमानी अचानक से भगवान बनकर सामने आ गए और अपने घर-मकान को उनके लिए बैंक में गिरवी रख दिया. अब इनके पास लाखों की लागत से सर्विस सेंटर और पार्ट्स की दुकान हो गई. वाहन की बिक्री और सर्विस सेंटर का परफौर्मेंस बेहतर हुआ तो कंपनी की तरफ से रांची के एरिया मैनेजर कमल जी ने वर्ष 2009 में अशफाक को डीलरशिप देकर पुरस्कृत करने का निर्णय लिया. अब फिर डीलरशिप के लिए बड़ी राशि चाहिए थे, पर अबतक मधेपुरा के बाय पास रोड में इन्होने 2 कट्ठा 12 धुर जमीन खरीद ली थी, जहाँ वर्तमान में शो रूम है. बैंक ने इसबार आसानी से लोन दिया और जनवरी 2010 में अशफाक आलम हीरो के विशालकाय शोरूम के मालिक बन गए, जहाँ अभी 150 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं और हजारों की संख्यां में मोटरसायकिल बिक्री के लिए उपलब्ध रहती है.
अशफाक बताते हैं कि जहाँ वर्ष 2003 में 15, 2004 में 20-25, 2005 में 50-55, 2006 में 60-65, 2007 में 70-75 मोटरसायकिल की बिक्री होती थी वहीँ 2008 के बाढ़ के बाद बिक्री में अचानक काफी उछाल आ गया. शायद आवागमन के रास्तों में व्यवधान होने से लोग मोटरसायकिल खरीदने में अधिक रुचि लेने लगे थे. कहते हैं कि शुक्रगुजार हूँ कंपनी के चेयरमैन वृज मोहन गुंजाल जी का जिन्होंने सेल के हिसाब से वाहनों की आपूर्ति की समस्या को दूर कर दिया. अब तो महीने में 13-14 सौ मोटरसायकिल शोरूम से बिक जाया करती है.

कई बातें रही सफलता के पीछे: अशफाक की असीमित उंचाई के सफ़र के पीछे कई बातें ख़ास रही. वे कहते हैं कि लोगों से जुड़कर रहना व्यवसाय को उन्नत कर गया. अभी भी वे मालिक की तरह नहीं रहकर शोरूम में ग्राहकों से सीधे जुड़कर बातें करते रहते हैं और कर्मचारियों के साथ भी मालिक-कर्मचारी जैसी भावना नहीं रखते हैं. कभी पैसे बचाने के लिए ट्रेन की साधारण बौगी में बैठकर दूर की यात्रा करने वाले इस सख्स ने परिस्थिति बदलने के बाद करीब दस देशों का भ्रमण भी कर लिया है. हालांकि नए शोरूम बनाने के समय मित्रों की मदद न मिल पाने से वे थोडा दुखी जरूर हुए थे पर हर हाल में काम के प्रति ईमानदारी और समर्पण को वे सबसे ऊपर स्थान देते हैं और कहते हैं कि काम को ही यदि भगवान मान लें तो सफलता तय मानिए. यानि सफलता का मूलमंत्र है WORK IS WORSHIP.
(ब्यूरो रिपोर्ट)

सक्सेस स्टोरी (5): कर्म को भगवान मानने वाले इस हीरो के पीछे भी है एक हीरो जिसने अपने घर-मकान को गिरवी रख कर की थी अशफाक की मदद: आसान नहीं था बाथरूम साइज के दुकान से भव्य शोरूम तक का सफ़र (अंतिम भाग) सक्सेस स्टोरी (5):  कर्म को भगवान मानने वाले इस हीरो के पीछे भी है एक हीरो जिसने अपने घर-मकान को गिरवी रख कर की थी अशफाक की मदद: आसान नहीं था बाथरूम साइज के दुकान से भव्य शोरूम तक का सफ़र (अंतिम भाग) Reviewed by मधेपुरा टाइम्स on October 08, 2015 Rating: 5

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