28 सितंबर 2017

जब राजा की पुत्री को मां दुर्गा ने कर लिया था आत्मसात, आलमनगर में दुर्गापूजा

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन से पहले से ही मधेपुरा के आलमनगर में चंदेलवंशी राज घराना कर रहा है माँ दुर्गा की पूजा. यहाँ फूल, फल, पत्तों आदि से होता है प्रतिमा का निर्माण.

 मधेपुरा जिले के आलमनगर स्थित राजघराने द्वारा दो शताब्दी पूर्व शुरू की गयी दुर्गा पूजा आज भी राज घराने के प्राचीनतम भगवती स्थान में हिन्दू-मुसलमानों के द्वारा सौहार्दपूर्ण माहौल में संपन्न करने की परंपरा कायम है. यहां प्रत्येक वर्ष नव पत्रिका अर्थात विभिन्न फलों, पेड़ों और उनके पत्तों से देवी को स्थापित किया जाता है.

दो शताब्दी से हो रही है पूजा: ज्ञात हो कि चंदेल वंश की एक रियासत के रूप में प्रसिद्ध शाह आलमगीर के समय का एक रियासत जो छह परगना के नाम से प्रसिद्ध था. इस रियासत की विधि व्यवस्था शाह आलमनगर से चलायी जाती थी. जिसे अब आलमनगर के नाम से जाना जाता है. इन्हीं चंदेल वंशी राजाओं द्वारा काली और दुर्गा पूजा की शुरूआत लगभग दो शताब्दी पूर्व भारत पर इस्ट इंडिया कंपनी के शासन से पहले ही शुरू की गयी थी. इस परंपरा को राज परिवारों के वंशजों ने अक्षुण्ण रखी है. यहां काली एवं दुर्गा की पूजा उग्र चंडा विधि से की जाती है. उग्र चंडा विधि से होती है पूजा: किवदंती है कि पहले यहां राजनिवास के प्रांगण में स्थित भगवती मंदिर में एक संगमरमर की अठारह भुजा वाली दुर्गा की प्रतिमा स्थापित थी. प्रत्येक मंगलवार को इस मंदिर में मां काली एवं दुर्गा को छाग बलि देने की परंपरा थी.

किवदंती है कि एक बार चंदेल राजा की पुत्री अलोपित हो गयी. जब राजा को इस बात का पता चला तो अपार दुख हुआ. पुत्री मोह एवं लोक निंदा से व्याकुल होकर राजा दुर्गा देवी के प्रतिमा के आगे पुत्री के न मिलने तक अन्न जल त्याग कर बैठ गये. इसी दौरान वह मूर्च्छित होकर गिर गये. कुछ समय बाद जब उन्हें होश आया तो दुर्गा की प्रतिमा से उनकी खोई हुई पुत्री का वस्त्र झूलता हुआ मिला जिससे राजा को ये ज्ञात हो गया कि उनकी पुत्री को मां दुर्गा ने आत्मसात कर लिया है. इस वजह से मूर्ति खंडित और अपवित्र हो गयी. इसके बाद इस मूर्ति को जल में प्रवाहित कर दिया गया. इसके बाद से नवपत्रिका की दुर्गा नवरात्र के सप्तमी के दिन बनाकर इनकी पूजा शुरू कर दी गयी. यह घटना 1862 ई० की बतायी जाती है. इस तरह तत्कालीन राजा नंदकिशोर सिंह के द्वारा शीतकालीन दुर्गा की मूर्ति पूजा को बंद कर नवपत्रिका की दुर्गा बनाकर श्रद्धा भाव से उग्र चंडा विधि से पूजा आरंभ की गयी. तीन ही स्थानों पर होती है यह पूजा: उग्र चंडा विधि से नव पत्रिका की पूजा बिहार में दरभंगा राज्य, गिद्धौर राज्य एवं आलमनगर राज्य में आज भी भक्ति भाव से की जाती है.

लोगों का कहना है कि दुर्गा को दीप दिखाने गयी राजा की पुत्री उल्टा हो कर लौट गयी जिससे कुपित होकर मां दुर्गा ने उन्हें आत्मसात कर लिया. आज इस खौफ से राज घराने की महिला सहमी रहती हैं. नवरात्र के दिनों में मां दुर्गा के कक्ष में राज घराने की महिला प्रवेश नहीं करती है. राजघराने के वंशज सर्वेश्वर प्रसाद सिंह आज भी इस परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं.

कठिन है नवपत्रिका देवी की स्थापना: नवपत्रिका के दुर्गा बनाने में बेल, अशोक, वृक्ष, धान, कच्चू का पौधा एवं मनीजरा का वृक्ष उपयोग होता है. 108 प्रकार के नदी, नद, समुद्र, झरना से शीत एवं गर्म पानी से मां दुर्गा को स्नान करा कर शुद्ध करने के उपरांत देवी को स्थापित की जाती है. आज भी पुराने परंपराओं को राज परिवार द्वारा निर्वाह करते हुए मां दुर्गा की अराधना होती हैं. देवी को चांदी से बने सिंहासन पर विराजमान कराया जाता है तथा चांदी के खंभों पर कपड़े की छतरी लगायी जाती है.
(रिपोर्ट: प्रेरणा किरण)

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