17 सितंबर 2017

गंगा-जमुनी तहजीब को गाली है साम्प्रदायिक दुर्भावना: विशाल, एजाज, शिवानी व जूही अव्वल

“साम्प्रदायिक दुर्भावना हमारी गंगा-जमुनी तहजीब को गालियाँ दे रही है. जो जुल्म मुगलों या अंग्रेजों ने हमारे देश पर नहीं किया वह आज हमारे देश के लोग एक-दूसरे पर कर रहे हैं.

क्या यह हमारी बदकिस्मती नहीं है और क्या इसे देश पर काला धब्बा नहीं कहेंगे? क्या कभी हमने सोचा है कि क्यों हम बात-बात पर एक-दूसरे से लड़ बैठते हैं और एक भाई दूसरे भाई का खून बहाने के लिए तैयार है? कारण तो हमलोग ही हैं न? गंदे नेताओं, कुछ गलत लोग, कुछ असामाजिक तत्वों, कुछ पैसों के लोभ में तो कभी छोटी-मोटी गलतियों की वजह से हमारे समाज के लोग एक-दूसरे का गला काटने को तैयार हो जाते हैं. हम दूसरों को कहने से पहले खुद के अन्दर झांकें कि हमारे अन्दर क्या बुराईयाँ हैं? हमारे बच्चे को कैसी तालीम दी जा रही है? हमारे बच्चे बाहर जाकर क्या कर रहे हैं और उनकी सोच किधर जा रही है? बाहर जाकर बचे कौन सा अच्छा काम कर आए हैं और कौन सा बुरा? हम उन्हें समझाएं देश की तरक्की के बारे में और रोकें बुरे नेताओं की बातों में जाने से, गंदी सोच से, गंदी आदतों से, गंदी चीजों से और गंदे लोगों की संगत में आने से.

आज हमारे देश में हम छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे धर्म और जाति के लोगों को मरने-मारने तक तैयार हो जाते हैं. हम इसलिए हिंसक होकर दंगा पर उतर आते हैं क्योंकि हमें अपना इतिहास तक सही तरीके से पता नहीं है. और इन्हीं बातों का फायदा उठाकर कुछ लोग अपना उल्लू सदा करने के लिए हमें लड़ा देते हैं. कोई कहता मैं पंजाबी हूँ, कोई बिहारी, कोई हिन्दू तो कोई मुसलमान. इन सबसे ऊपर उठकर देखें तो हमें लगेगा कि हिन्दुस्तान तो कहीं है ही नहीं? लड़ना ही है तो हम अपने हक़ के लिए, भ्रष्टाचार के खिलाफ, गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ लड़ें. पहले आप खुद बदलें, देश तब ही बदल पायेगा.

समाज में साप्रदायिक दुर्भावना बढ़ रही है और इसकी सबसे बड़ी वजह अशिक्षा है. आज कई ऐसे नवयुवक हैं जो बिना सोचे-समझे खुद को किसी काम में शामिल कर लेते हैं. ये अपने दोस्तों को झूठी या अधूरी सूचना देकर उनसे भी उस काम में शामिल होने की अपील करने लगता है और प्रशासन के सामने समस्या उत्पन्न कर देता है. हमारी एक गलती सबों को परेशानी में डाल देता है. साम्प्रदायिक दुर्भावना बढ़ाने के पीछे सबसे बड़ा कारण सोशल मीडिया है और मीडिया वाले भी तो अपना टीआरपी बढ़ाने के लिए कुछ भी कर जाते हैं.

बड़ा विचित्र देश है हमारा भारत. जो आजादी हमें मिली वही आजादी हमारे समाज को नष्ट कर रही है. हम क्यूँ भूल जाते हैं कि किसी भी समस्या को बढ़ावा देने से हमारा समाज नष्ट हो जाएगा. ख़ास कर युवाओं को माता-पिता ने पढ़ने-लिखने के लिए भेजा है. और हम हैं कि कभी-कभी हम अपनी जिम्मेवारी को भूल कर पत्थर बाजी और आतंक को जाने-अनजाने में बढ़ावा देने में लग जाते हैं. दरअसल साम्प्रदायिक दुर्भावना का कारण भी हम ही हैं और समाधान भी हम. समाज में सभी वर्गों के लोगों को मिलजुलकर रहना चाहिए ताकि साम्प्रदायिकता की आग में झुलसने से हमारा देश बच सके.”

दरअसल सोचने पर मजबूर कर देने वाली बातें हम नहीं कह रहे हैं. ये मधेपुरा के उन छात्र-छात्राओं की भाषा, भावना और सोच है जो परिवर्तन लाने के लिए बेचैन दिख रहे हैं. हिन्दी दिवस पर मधेपुरा के समिधा ग्रुप और मधेपुरा टाइम्स की तरफ से आयोजित लेखनी प्रतियोगिता में भाग लिए 139 छात्र-छात्राओं के विचार आज के कई नेताओं और साम्प्रदायिक हो चले कई युवाओं के गाल पर करारा तमाचा है. समिधा ग्रुप के हर छात्र की लेखनी अलग सन्देश देती है तो प्रथम घोषित किये गए विशाल भारती, दूसरे स्थान पर रहे मो० एजाज और तीसरे स्थान पर रही शिवानी अग्रवाल तथा जूही कुमारी के अलावे अभिनव कुमार, अमर कुमार आदि के विचारों का सारांश ऊपर है.

इसके अलावे मिथिलेश कुमार, प्रिया भारती, निकिता, मिट्ठू कुमार, सुमित कुमार, निशि कुमारी, सौरभ कुमार रेशमी कुमारी, प्रियंका कुमारी, ब्यूटी कुमारी, रोशन कुमार,सुमन कुमार समेत बहुत से ऐसे छात्र-छात्राएं मन में कुछ इस तरह के विचारों को पाल रहे हैं जो समाज को नई दिशा देने वाले हैं.

समिधा ग्रुप के माध्यम से इस कम्प्यूटर संस्था संचालक और मधेपुरा के हजारों छात्र-छात्राओं को सही और निर्णायक दिशा देने वाले संदीप शांडिल्य भी इस बात को मानते हैं कि इनकी सोच जानकर वे खुद हतप्रभ रह जाते हैं. वे कहते हैं कि जरूरत है ऐसे युवाओं की एक फ़ौज तैयार करने की जो साम्प्रदायिक दुर्भावना बढ़ाने वाले समाज के काले धब्बों का डट कर मुकाबला करे और समाज में सौहार्द को हमेशा जिन्दा रखें. वे कहते हैं कि ऐसी फ़ौज जल्द तैयार करेंगे जो एक रणनीति के तहत समाज को बुरे वक्त में बचाने का काम करेगी.
(रिपोर्ट: आर.के. सिंह) 

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