05 अगस्त 2017

स्मृतिशेष विजय शर्मा: आप क्या गए, पत्र-पत्रिकाओं की दुनियां ही उजड़ गई...

पांच साल बीत गए, उन्हें इस दुनियाँ को छोड़े हुए. छात्र जीवन में भी मैं जब कभी मधेपुरा रेलवे स्टेशन जाता था, कदम अपने आप उस बुक स्टॉल की तरफ बढ़ जाते थे, जहाँ पत्र-पत्रिकाओं से लेकर उपन्यास और बहुत सी अन्य उपयोगी पुस्तकें मिल जाती थी और मिल जाते थे मधेपुरा में पत्र-पत्रिकाओं को लोकप्रिय बनाने वाले सबसे महत्वपूर्ण शख्सियत.

विजय कुमार शर्मा न सिर्फ खुद पुस्तकों के शौकीन थे बल्कि लोगों में भी अखबार और पत्रिकाओं के प्रति रुचि जगाते रहते थे. राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर पर अच्छी पकड़ रखने वाले विजय जी ने तापमान समेत कई साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं के लिए पत्रकारिता भी की और उनके असरदार लेख हमेशा सराहे गए.

मुझे याद है, आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियाँ पढ़ने के लिए उन्होंने ही मुझे प्रेरित किया था. शायद ऐसी ही कुछ वजह रही थी कि कई बार मैं पटना जाने के लिए मुरलीगंज में ट्रेन न पकड़कर कुछ घंटे पहले मधेपुरा आ जाता था और उस बुक स्टॉल पर विजय जी से बातें भी करता और कुछ किताबें भी खरीद लेता था. मधेपुरा में रहने के दौरान कम्प्यूटर और तकनीक से जुड़ी एक पत्रिका Digit भी वे मधेपुरा में सिर्फ मेरे लिए नियमित मंगाते रहे थे. पर 5 अगस्त 2012 की उस मनहूस शाम को जो खबर मिली, उसने मुझे सन्न कर दिया. आंत की बीमारी से कुछ दिनों से ग्रसित पत्रकार विजय कुमार शर्मा ने दिल्ली के सफदरगंज अस्पताल में इस दुनियाँ को अलविदा कह दिया.

उनकी असामयिक मौत के बाद गुलजारबाग स्थित उनके आवास पर अंतिम बार जाने के बाद फिर मैं हिम्मत नहीं जुटा सका कि उस घर या ज्ञान का भंडार देने वाले रेलवे स्टेशन पर के उनके बुकस्टॉल पर जा सकूं. श्रद्धांजलि में जो समझ में आया किया, मैंने मैगजीन पढ़ना कम कर दिया. कल से बार-बार पांच साल पहले लिखी उनपर इस खबर (नहीं रहे हरदिलअजीज पत्रकार विजय शर्मा) को पढ़ रहा हूँ और किसी शायर की लिखी वो दो पंक्तियाँ याद आ रही है कि-

'इन्तजार है हमें तो बस अपनी मौत का,
उनका वादा है कि उस दिन मुलाकात होगी.'

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