08 जनवरी 2017

“किसान आत्महत्या और विकास का नीतीश मॉडल”: निखिल मंडल


यह बार-बार दोहराया जाता है कि भारत किसानों का देश है। पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश में जय जवान-जय किसानका नारा दिया था। यानी जितनी जय जवानों की, उतनी ही जय किसानों की। दोनों भारत के रथ के दो पहिये हैं।
एक भी पहिया कमजोर हुआ, तो देश का रथ लड़खड़ा जाएगा। निश्चित तौर पर पिछली सरकारें इस दिशा में काम करती रही हैं। ये बात अलग है कि इस दिशा में जितनी सफलता मिलनी चाहिए थी, वह मिल नहीं पायी है। लेकिन फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर जवानों ने हमारे सरहदों की रक्षा की है, तो किसानों ने हमें अन्न उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया है। किसी जमाने में हम अनाजों के आयातक थे। आज हम आयात नहीं करते, बल्कि निर्यात करते हैं। इसके लिए हमारे किसानों की जितनी प्रशंसा की जाये, उनके प्रति जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाये, वह कम है। एक भूखा व्यक्ति या भूखा देश कभी अपनी रक्षा नहीं कर सकता। इस नाते देश की रक्षा में हमारा पेट भरनेवाले किसानों की भूमिका बेहद अहम है।

लेकिन जहां एक तरफ सीमा पर देश की रक्षा करनेवाला जवान, सीमा पार से हो रही गोलाबारी और आतंकी हमलों में लगातार अपनी जान गंवा रहा है, वहीं हमारे किसान अपने खेतों में दम तोड़ रहे हैं। देश के लिए भरपूर फसल उपजाने के बावजूद वे कर्ज की मार से मर रहे हैं। तमाम नीतियों के बावजूद आज तक किसानों की उपज की सही, प्रभावशाली बीमा की योजना जमीन पर उतर नहीं पायी है। इसका खामियाजा हमारे अन्नतादा किसानों को चुकाना पड़ रहा है।     

      आंकड़ों को देखें, तो पिछले दो सालों में किसानों की आत्महत्या के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। केंद्र में एनडीए सरकार के आगमन के बाद, किसानों की आत्महत्या के मामलों में हुई वृद्धि, किसानों के प्रति केंद्र सरकार की बेरुखी को बयान करती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के हालिया आंकड़े किसानों की दुर्दशा की चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आगमन के बाद 2014-15 में किसानों की आत्महत्या के मामलों में 42 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसके मुताबिक सिर्फ 2014 में किसानों की आत्महत्या के 5,650 मामले दर्ज किये गये। नये आंकड़ों में ये आंकड़ा बढ़ कर 8,007 तक पहुंच गया। इन आंकड़ों के पीछे वजह 2014 और 2015 में विभिन्न राज्यों में लगातार दो साल आये सूखे को माना जा रहा है। 2015 में किसान आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र में दर्ज किये गये। यहां 3,030 किसानों ने किसानी करने की जगह मौत को गले लगाने का रास्ता अपनाया। इसके बाद तेलंगाना और कर्नाटक का नंबर रहा। किसानों की आत्महत्या के 94 फीसदी आंकड़े सिर्फ छह राज्यों से आये- महाराष्ट्र, तेलंगान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़। यहां एक बात ध्यान देनेवाली है कि नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से एक भी किसान आत्महत्या का केस दर्ज नहीं किया गया। इन राज्यों में बिहार भी शामिल है। सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या के मामले दर्ज करनेवाले राज्यों की सूची और शून्य मामले दर्ज करनेवाले राज्यों की सूची के बीच तुलना सहज ही एक खास संदर्भ ग्रहण कर लेता है। जिन राज्यों से किसानों की आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले आये हैं, उनमें कर्नाटक को छोड़ कर बाकी सभी में भाजपा नेतृत्व वाली या भाजपा के सहयोगियों की सरकारें हैं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो उनकी ही सरकार है। क्या इस आंकड़े से कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
भौगोलिक एवं ऐतिहासिक रूप से महाराष्ट्र का विदर्भ, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश का रायलसीमा आदि क्षेत्र सूखाग्रस्त क्षेत्र रहे हैं। इन इलाकों के लिए कभी केंद्र सरकार विशेष कार्यक्रम भी चलाती थी। ऐसे इलाकों की दशा सुधारने के लिए मनरेगा के तहत रोजगार गारंटी की भी भूमिका देखी गयी थी। लेकिन ऐसा लगता है कि मौजूदा शासन में सूखे के कारण बिगड़ी दशा में सरकार द्वारा जरूरी हस्तक्षेप और मदद किसानों को समय पर नहीं पहुंच पा रही है। अगर फसल खराब होने की दशा में किसानों को समुचित मदद मुहैया हो जाये, तो किसान यह दुखद कदम नहीं उठाएंगे। लेकिन, सरकार की सोच कैसी है, यह पिछले साल केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के बयान से ही जाहिर हो गयी थी। तब एक असंवेदशनशील बयान देते हुए श्री राधामोहन सिंह ने किसानों की आत्महत्या की वजह असफल प्रेमको बताया था।

किसानों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण कर्ज और दिवालियापन है। यह भ्रम हो सकता है कि किसानों की आत्महत्या की वजह महाजनों से लिया गया कर्ज हो सकता है। लेकिन आज के इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से यह भ्रम भी दूर हो जाता है। आज इंडियन एक्सप्रेस ने खबर की है कि कर्ज के कारण आत्महत्या करनेवाले किसानों में से 80 फीसदी किसानों ने महाजनों से कर्ज लेकर, बैंकों या माइक्रो फिनांस संस्थानों से कर्ज लिया था। यह एक डरावना तथ्य है।

सरकार को अपने गिरेबान में झांक कर खुद से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर यह कैसा देश बनाया जा रहा है, जिसमें करोड़ों डकार कर कोई उद्योगपति विदेश में आराम फरमा रहा है और वहीं अपने खून-पसीने से देश की सेवा करनेवाला किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहा है! आंकड़े बताते हैं कि आत्महत्या करनेवाले किसानों में 73 फीसदी छोटे या सीमांत काश्तकार थे। जाहिर है, सबसे कमजोर व्यक्ति की मदद करने में मौजूदा सरकार पूरी तरह से विफल रही है।

वास्तव में पिछले वर्षों में जो समावेशी विकासकी अवधारणा का विकास हुआ था, जिसके तहत मनरेगा जैसे सामाजिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई थी, उसे मौजूदा केंद्र सरकार ने भुला दिया है। केंद्र के सामने बिहार एक नजीर है। बिहार में जहां पिछले 10-11 वर्षों में अर्थव्यवस्था की लगातार तरक्की हुई है, वहीं इस बात का भी ख्याल रखा गया है कि विकास का फल सिर्फ मुट्ठी भर लोगों में ही सिमटा रह जाए। बिहार से किसान आत्महत्या का कोई मामला दर्ज होना, विकास के नीतीश मॉडलकी सफलता को दर्शाता है। केंद्र सरकार इस मॉडल से चाहे तो सीख ले सकती है।


निखिल मंडल 
(लेखक जनता दल यूनाइटेड के बिहार प्रदेश प्रवक्ता हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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