15 नवंबर 2017

‘हिन्दी एवं उर्दू दोनों मिलकर भारत को पूर्ण बनाती हैं’: राष्ट्रीय सेमिनार में कुलपति

भारत की साझी संस्कृति अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध है। हमारी सभी भाषाएँ इस साझी संस्कृति की वाहक हैं। हिन्दी, उर्दू एवं अन्य सभी भारतीय भाषाएँ सगी बहनें हैं। सभी एक-दूसरे की पूरक हैं। जैसे कई नदियाँ मिलकर गंगा को समृद्ध करती हैं, वैसे ही सभी भारतीय भाषाएँ मिलकर हिन्दी समृद्ध करती हैं।

यह बात कुलपति प्रोफेसर डॉ. अवध किशोर राय ने कही। वे बुधवार को विश्वविद्यालय प्रेक्षागृह में स्नातकोत्तर उर्दू विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में उद्घाटनकर्ता के रूप में बोल रहे थे। बिहार उर्दू अकादमी द्वारा प्रायोजित इस सेमिनार का विषय 'उर्दू : एक मुश्तरका विरासत' था।
कुलपति ने कहा कि सभी भाषाओं के समुचित विकास हेतु प्रयास करने की जरूरत है। इसी कड़ी में विश्वविद्यालय द्वारा स्नातकोत्तर उर्दू विभाग को एक स्वतंत्र भवन आवंटित किया गया है। नये भवन में विभाग के उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद उर्दू विभाग द्वारा राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जाना हमारे लिए गौरव की बात है। 

कुलपति ने कहा कि हिन्दी एवं उर्दू दोनों एक दूसरे से अभिन्न है। दोनों को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। दोनों मिलकर एक सुन्दर आभूषण बनाती हैं। हिन्दी सोने की अंगूठी है और उर्दू उस अंगूठी में जरा हीरे का नगीना है। हिन्दी एवं उर्दू दोनों मिलकर भारत को पूर्ण बनाती हैं। रसखान, जायसी, मोहम्मद इकबाल, प्रेमचंद सबका यही संदेश है।

कुलपति ने कहा कि कोई भी भाषा किसी भी खास जाति या मजहब की बंदिनी नहीं हैं, बल्कि सभी भाषाए हमारी साझी विरासत हैं। किसी भी भाषा का किसी से कोई वैर नहीं है। सबके बीच सुमधुर समन्वय है। भाषाओं के चेहरे भले अलग-अलग हो, दिल एक है।

कुलपति ने कहा कि भाषाएँ सभ्यता-संस्कृति, साहित्य एवं ज्ञान-विज्ञान की वाहक है। कोई भी भाषा ज्ञान-विज्ञान की बाधक नहीं है। अतः उर्दू माध्यम से संचालित मदरसों एवं अन्य शिक्षण संस्थानों में भी विज्ञान, कम्प्यूटर आदि विषयों की पढ़ाई पर जोर दिया जाना चाहिए। हम सबमें वैज्ञानिक सोच का विकास होगा तो हम अच्छे नागरिक बनेंगे।

 प्रतिकुलपति प्रोफेसर डॉ. फारूक अली ने कहा कि उर्दू एवं हिन्दी भारत माता की दो खूबसूरत आँखें हैं। उर्दू का शाब्दिक अर्थ लश्कर अर्थात् फौज है। आजादी की लड़ाई में हिन्दी एवं उर्दू ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।

प्रति कुलपति ने कहा कि हिन्दुस्तान में सभी सम्प्रदाय को समान अवसर मिला। भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में उर्दू के संरक्षण, संवर्धन एवं परिवर्धन के प्रावधान किया गया है। बिहार सरकार ने उर्दू को राज्य की दूसरी राजभाषा का दर्जा देकर सराह नीय कार्य किया है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ से आए अतिथि मो. अली जौहर ने कहा कि उर्दू ने आजादी में अहम भूमिका निभाई है। यह जबान हिन्दू-मुस्लिम की साझी विरासत है। लेकिन आजादी के बाद उर्दू को उसका वाजिव हक एवं सम्मान नहीं मिला। आज उर्दू अपने ही घर में उपेक्षित है। यह जबान बेघर एवं बेइलाका है। अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ. फसीहउद्दीन अहमद ने की। संचालन डॉ. अबुल फजल ने किया।

सेमिनार में जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के डॉ.  मो. सैफुल्ला सैफूल, एलएनएमयू, दरभंगा के डॉ. रईस अनवर, छात्र कल्याण अध्यक्ष डॉ. अनिलकान्त मिश्र, मानवीकी संकायाध्यक्ष डॉ. ज्ञानंजय द्विवेदी, डॉ. नरेश कुमार, डॉ. चन्द्रकान्त यादव, डॉ. बी. एन. विवेका, डॉ.  विनय कुमार चौधरी, डॉ.  एम. आई. रहमान, मो.  सलमान, डॉ. सुधांशु शेखर आदि उपस्थित थे।

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