जिंदगी की तपती धूप में
जब खोली आंख तो अपनी माँ को
मुस्कुराता हुआ पाया है मैंने..
जब भी माँ का नाम लिया.
उसका बेशुमार प्यार पाया है मैंने..
जब कोई दर्द महसूस हुई,
जब कोई मुश्किल आई
उस पहलू में अपनी
जगती रही वो रात भर मेरे लिए
जाने कितनी रातें जगाई है मैंने..
जिसकी दुआ से हर मुसीबत लौट जाये
ऐसा फरिस्ता पाया है मैंने..
मेरे हर फिकर को जानने वाली
मेरी जज्बातों को पहचानने वाली
ऐसी हस्ती पायी है मैंने..
मेरी जिंदगी सिर्फ मेरी माँ है
इसी के लिए तो
इसी के लिए तो जिंदगी की
समां जला रखी है मैंने..
--अभिषेक प्रताप सिंह, मधेपुरा.
मेरी जिंदगी सिर्फ मेरी माँ है ///अभिषेक
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
on
July 29, 2012
Rating:

wah abhishek bhai kya kavita likhi aapne.sach kahe aapka kavita to book sab me hona chahiye.Madhepura Times se mera anurodh hai ki wo is kavita ko dur-dur tak failaye
ReplyDeleteSo nice poem
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