20 अप्रैल 2017

‘फूलों ने रो-रो कर, सुना दी दास्ताँ अपनी”: गांधी पर सिंहेश्वर में उम्दा व्याख्यान कार्यक्रम

‘साजिश थी किसी मासूम, कली को मसलने की ।
लगा कर दाग दामन में, गली को कुचलने की ।
पर जिसने सिख लिया, गोता लगाना समुंदर में ।
खुदा भी चाह नही सकता, उसे डुबने डुबोने की ।
तुफानो में भी नाविक, किनारा खोज लेते हैं ।
साहिल थामता जब, वो सहारा खोज लेते हैं ।
वक्त का काम है आकर,  के गुजर जाना ।
सर पर हो हाथ रहबर का, सफर का मौज लेते हैं ।
उसे तोहमत लगाने की, आदत पुरानी है ।
चमन के बर्बादी की, यह अनबूझ कहानी है ।
फूलों ने रो-रो कर, सुना दी दास्ताँ अपनी ।
न मौसम की हवा बदली, न बदला पानी है ।’

     ये पंक्तियाँ गांधी के विचारों को रखते हुए कोशी के ‘कुमार विश्वास’ विश्वनाथ विवेका ने रखी । उन्होंने कहा गांधी जी के अहिंसा का मतलब यह नहीं है कि कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो हम दूसरा गाल बढ़ा दे । उनकी अहिंसा डरपोक और कायरों के लिए नही है । उन्होंने कहा जब हम कहते हैं हम बिहारी है, बंगाली है, पंजाबी है तो यह खतरनाक है । गांधी के विचारों को किसी हुमिनिजम में बांध कर रखना हमारी मूर्खता है । उन्होंने कहा गांधी जन्म से नही कर्म से महान थे । चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी समारोह वर्ष में कृषि कार्यालय के सभा भवन में। गांधी के विचारों का व्याख्यान कार्यक्रम में जिले के कई प्रबुद्धजनो एवं वक्ताओं ने संबोधित किया । मधेपुरा के समाज सेविका प्रज्ञा प्रसाद ने कहा कि गांधी के अहिंसापूर्वक किये गये सत्याग्रह के कारण हमे आजादी मिली । लेकिन आजादी के साथ ही हमे एक दु:स्वप्न भी झेलना पडा । हर गांव में एक हिन्दू मुस्लिम टोला है । गांधी के विचारों में हम जब हम एक है तो हमे टोलों में बांटने की क्या जरूरत है । वही मीनाक्षी वर्मा ने गांधी के सपनो को विस्तार से बताया कहा कि गांधी ने जो महसूस किया जो जिया वही विचार लोगो तक पहुंचाया । गांधी के सत्याग्रह ने लोगों के तन मन और विचार सबको आंदोलित कर दिया । यह हवा घर- घर और द्वार- द्वार आंदोलन की ऐसी बयार बह निकली कि यह जन जन के मन में घुसने लगी । यही वह शब्द थे जनता को दिल और दिमाग से जोड दिया । इसका एक उदाहरण देते हुए कहा चंपारण सत्याग्रह के लिए राज कुमार शुक्ल के आमंत्रण पर जब चंपारण  पहुंचे तो उनके साथ कई महत्वपूर्ण लोग थे । रात में गांधी जी ने देखा कि अलग अलग शिवरो में सबके लिए अलग अलग खाना बन रहा है । क्योंकि सभी अलग अलग जाति के थे उनके हिसाब से खाना बन रहा था । यह देखकर उन्होंने ने वहा से वापस लौटने का निर्णय लिया । सभी लोगों ने कारण पूछा और उन्हें बहुत रोकने की कोशिश की । अंत में उन्होंने कहा जब सबके लिए साझा-चुल्हा पर खाना बनेगा तो ही रुकूंगा. और सभी को मानना पडा । यानि उन्होंने ने भारत के अध्ययन में यह जाना यहा छुआछूत नाम का जहर जब तक समाज से नही मिटेगा तब तक हम आजाद नही हो सकते । उन्होंने कहा क्या आज के दौड में भी गांधी प्रासंगिक है तो जबाब है कि क्या आज भी जातिवाद हावी नही है ? क्या आज छुआछूत पूरी  तरह खत्म हो गया ? जबाब है नही तो गांधी आज भी उतना ही प्रासंगिक हैं । उन्होंने कहा गांधी ने कहा हमारे यहा दो तरह का भारत है । एक है ग्रामीण भारत जो गांवों में बसता है । दूसरा है इंडिया जो शहरो में बसता है । ग्रामीण भारत में ही देश की आत्मा बसती है ।
     डा. भुपेंद्र मधेपुरी ने गांधी के विचारों को रखते हुए कहा गांधी ने 1934 में आये विनाशकारी भूकंप को भी  छुआछूत का ईशवरीय फल बताया था । उनके विचारों की महानता उनके इस कथन में दिखती है । जब उन्होंने ने कहा धरती पर कोई भी आत्मा अशिक्षित नही रहे । यानी उनके विचारों को किसी जाति धर्म और देश की सीमा से नही बांधा नही जा सकता है । सीओ कृष्ण कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा गांधी का स्पस्ट विचार था अगर आजादी पानी है तो आंदोलन लंबा होगा और हिंसा के बल पर कोई आंदोलन ज्यादा दिन नही चल सकता है । इसलिये उन्होंने अहिंसा को ही अपना हथियार बना लिया । सीओ श्री कुमार ने कहा गांधी के विचारों का व्याख्यान पंचायत  स्तर पर भी होने की बात कही ताकि उनके विचार गांव के हर तबके तक पहुंचे । उन्होंने बकरी के दूध को अति उत्तम बताया । गाय को हमारे साथ साथ कृषि के लिए वरदान बताया । इस तरह की जमीनी बातो के कारण लोग उनसे जुडते चले गये । अंत में उन्होंने ने एक पंक्ति कहते हुए कहते हुए अपनी बात समाप्त किया ।

‘आग मेरे सीने में न तेरे सीने में सही, ये आग जलनी चाहिए ।
गांधी के विचारों की हिमालय से, कोई गंगा निकलनी चाहिए ।‘

       कार्यक्रम में डा श्यामल प्रसाद, डा. आनंद भगत, विनय कुमार चौधरी, शिया शरण भारती ने भी अपने विचार व्यक्त किए । मौके पर कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रमुख चंद्र कला देवी, संचालन पुर्व उप प्रमुख राजेश कुमार रंजन,  बीएओ संजय सिंह, जेई संजय कुमार, दीप नारायण यादव, गवेनद्र प्रसाद, लालेशवर झा, विशंभर ठाकुर, महेश चौपाल, रूपक कुमार, रिभा कुमारी, शंकु कुमारी, उषा देवी, अमर कांत कुमार, लाल भगत, इजहार आलम, राणा संग्राम सिंह,  विजय भगत, पंसस शंभू मंडल, मनोज सादा, जय प्रकाश यादव मौजूद थे ।

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