पहले दिन गणगौर माता की विधिवत पूजा-अर्चना कर सिंधारा उत्सव मनाया गया। इसके बाद विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ, जिसमें आकर्षक स्टॉल, मनोरंजक प्रतियोगिताएं, नृत्य-संगीत और अन्य रचनात्मक गतिविधियां शामिल रहीं। देर शाम तक महिलाएं और बच्चियां उत्साहपूर्वक कार्यक्रम का आनंद उठाती रहीं।
दूसरे दिन भी विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिला। कुँवारी लड़कियों एवं विवाहित महिलाओं ने भगवान शिव (ईसर जी) और माता पार्वती (गौरी) की पूजा-अर्चना की। पूजा के दौरान महिलाओं ने दूब से जल के छींटे देते हुए “गोर गोर गोमती” जैसे पारंपरिक लोकगीत गाए। रेणुका की गौर बनाकर उस पर महावर, सिंदूर और चूड़ियां अर्पित करने की परंपरा भी निभाई गई। चंदन, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य से विधिपूर्वक पूजन कर भोग लगाया गया।
महोत्सव के दौरान गणगौर पर्व के धार्मिक महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। बताया गया कि यह पावन पर्व होलिका दहन के दूसरे दिन चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से प्रारंभ होकर चैत्र शुक्ल तृतीया तक 18 दिनों तक मनाया जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में माता गौरी अपने पीहर आती हैं और बाद में भगवान शिव उन्हें ससम्मान विदा कर अपने साथ ले जाते हैं।
इस पर्व में कुँवारी कन्याएं मनपसंद वर की कामना करती हैं, जबकि विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। गणगौर पूजा में गाए जाने वाले लोकगीत इस परंपरा की आत्मा माने जाते हैं, जिनमें गोरी और ईसर को पारिवारिक रिश्तों के रूप में संबोधित कर पूजा की जाती है।
कार्यक्रम के समापन पर गणगौर माता की विदाई पूरे विधि-विधान और भावनात्मक माहौल में की गई। महिलाओं ने अखंड सौभाग्य और परिवार की खुशहाली की कामना करते हुए माता से अगले वर्ष पुनः आगमन का आग्रह किया।
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
on
March 21, 2026
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