मनुष्य की मौत निश्चित है. इसके लिए मनुष्य को जिसके साथ वियोग है, उसके साथ योग करें. परमात्मा को आप प्रेम से पायेंगे, पाखण्ड से नहीं. वासना के कारण मनुष्य परमात्मा से वियोग करने लगते हैं. इसलिए वासना को त्याग कर परमात्मा से योग करने पर ही मनुष्य का जीवन सफल होगा. आसानी से मोक्ष की प्राप्ति कभी नहीं होगी. जिसके पास जितना ज्ञान है, वह उतना ही सुखी है. मनुष्य मूलत: दो तरह के कर्म करते हैं- पाप और पुण्य. मनुष्य को हमेशा पुण्य कार्य कर पुण्य का भागी बनना चाहिए. द्रौपदी यदि दुर्योधन को अंधे का बीटा न कहती तो आज महाभारत का स्वरुप देखने को नहीं मिलता. तीर या तलवार के घाव तो भर जाते हैं, पर बोली-वचन के घाव कभी नहीं भरते. इसलिए मनुष्य को अपनी वाणी पर संयम बरतना चाहिए.अकाट्य ज्ञान की उक्त बातें गम्हरिया में संत महर्षि मेही के सिद्धपीठ महर्षि मेही आश्रम कुप्पाघाट, भागलपुर के वर्तमान आचार्य महर्षि हरिनंदन परमहंस जी महाराज ने बुधवार को दो दिनों तक चले संतमत सत्संग के समापन अवसर पर कही. सत्संग में दूर-दूर के इलाके से महिलाओं और पुरुषों ने शिरकत किया.
बता दें कि मधेपुरा जिला का गम्हरिया बीसवीं सदी के महान संत महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज की जन्मभूमि रही है और यहाँ के लोगों को सत्संग से ख़ासा लगाव रहा है.
‘वासना के कारण मनुष्य परमात्मा से वियोग करने लगते हैं’: महर्षि हरिनंदन
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
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December 17, 2015
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