20 सितंबर 2016

मरूआ: विलुप्त हो रहा है डायबीटीज से लेकर जिउतिया में उपयोगी कोसी और मिथिलांचल का गोल्ड ग्रेन

सुपौल। देश के प्रधानमंत्री ने भले ही किसानों की समृद्धि के लिए फसल बीमा योजना लागू कर किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूती प्रदान करने की दिशा में सार्थक पहल किया है, लेकिन कोसी इलाके के गोल्ड ग्रेन कही जाने वाली मरूआ की खेती से किसान विमुख हो रहे हैं.
     कोसी, मिथिलांचल और सीमांचल की बलुआई मिट्टी में प्रचुर मात्रा में पैदावार होने वाली मरूआ की फसल अब विलुप्त के कगार पर है. नई पीढ़ी के लोग इस अनाज से बनने वाले व्यंजन को चखने की बात तो दूर देखे भी नहीं है. इस फसल की पैदावार की दिशा में यदि प्रशासनिक पहल नहीं होती है तो वह दिन दूर नहीं जब इलाके से चीन और कोनी की फसल के ही तरह गहरे और हलके दो रंगों में होने वाले इस फसल का भी नामोनिशान मिट जायेगा.

भारतीय संस्कृति से जुड़ा है मरूआ: कोसी और मिथिलांचल में कई ऐसे फसल की पैदावार की जाती है, जिसका धार्मिक पहलू के साथ भारतीय संस्कृति से भी जुड़ाव है. तिल, जौ, सिंगहाड़ा, मखाना और मरूआ को लोग कई धार्मिक अनुष्ठान में विधि-विधान से भगवान को भोग लगाते है. कहा जाता है कि तीन दशक पूर्व जब बाहरी प्रदेश के लोगों का आगमन इस इलाके में होता था तो, यहां के लोग बड़े आदर से उन्हें मरूआ की रोटी खिलाते थे.लेकिन तेजी बढ रहे फास्ट फूड के प्रचलन से यह प्रथा अब उठ गयी है.

जिउतिया में है खास महत्व: नवरात्रा से सात दिन पूर्व मनाये जाने वाले पुत्र जीविका व्रत यानि जिउतिया में मरूआ की रोटी खाने बिना मां यह व्रत नहीं रखती है. भारतीय परंपरा के अनुरूप मां अपने सखा-संतान के दीघार्यु की कामना को लेकर नहाय-खाय के दिन मरूआ की रोटी खाकर यह निर्जला व्रत रखती है. देश और विदेश में भी मां के द्वारा यह व्रत रखा जाता है. जहां मरूआ उपलब्ध नहीं होता, वहां बिहार के संबंधित लोग कुरियर के द्वारा मरूआ की आटा मांग कर यह व्रत को रखती है. लंदन में वर्षो से रह रही सुपौल की रूबी बताती है कि वे पिछले एक दशक से लंदन में रह रही हैं. लेकिन हर वर्ष वह यह व्रत रखती है, वह अपने संबंधी द्वारा मरूआ का आटा मगांकर व्रत को निष्ठापूर्वक करती है.

अंतिम संस्कार में भी होता है प्रयोग: कोसी व मिथिलांचल में मनुष्य के मरणोपरांत गंगा लाभ दौरान होने वाले क्रिया कर्म के उपरांत, माछ-मरूआ खाने की भी परंपरा कायम है. शोकाकुल परिवार द्वादशा के बाद माछ-मरूआ को निश्चित रूप से खाते हैं. कहा जाता है कि पूर्वजों के द्वारा ही यह पद्धति बनाई गी थी, जिसका अनुसरण आज भी लोग करते हैं. मान्यता है कि उस दिन माछ-मरूआ खाने के बाद लोग किसी भी दिन मांसहारी भोजन कर सकते हैं. यदि उस दिन शोकाकुल परिवार माछ-मरूआ नहीं खाते हैं तो वह एक साल तक मांसहारी भोजन नहीं करते हैं.

डाइबिटीज मरीज के लिए है उपयोगी: तीन दशक पूर्व इस इलाके के लोगों को डाइबिटीज की बीमारी बहुत कम होती थी. कहा जाता है कि लोगों के द्वारा प्रचुर मात्रा में मरूआ का सेवन किया जाता था, जिस कारण यहां के लोगों में यह बीमारी नहीं होती थी. लेकिन आज के परिवेश में सुगर के मरीज मरूआ का सेवन कर रहे हैं, जिन्हें सुगर की बीमारी की रोकथाम में मदद मिलती है. बताया जाता है कि इसमें काब्रोहाइर्डेड की मात्रा काफी कम पायी जाती है, जिस कारण यह सुगर के मरीज के लिए फायदेमंद होता है.
     मरूआ की खेती के संबंध में जिला उद्यान पदाधिकारी ज्ञानेंद्र ने बताया कि इस फसल में बहुत ज्यादा मेहनत-मजदूरी लगती है, साथ ही इसका बाजार भाव काफी कम हो गया है. जिस कारण यहां के किसान मरूआ की खेती करने में कम दिलचस्पी दिखाते हैं.    

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