30 मई 2016

बीबीसी और क्विंट समेत दर्जनों वेबसाइट्स और अखबारों की शोभा बढ़ा चुकी है कोसी के सबसे चर्चित फोटोजर्नलिस्ट अजय कुमार की तस्वीरें

कहते हैं हजार शब्द जो बात नहीं कह पाते हैं एक तस्वीर कह देती है और तस्वीर यदि दिल को छूने वाली हो तो क्या कहना? पर कोसी के सबसे चर्चित फोटोजर्नलिस्ट अजय कुमार जैसी तस्वीरें ले पाना सबके वश की बात भी नहीं है. तब ही तो शानदार फोटोग्राफी करने वाले अजय कुमार की तस्वीरें तीन बार बीबीसी.कॉम की शोभा बढ़ा चुकी है.
    यही नहीं, बीबीसी के अलावे प्रसिद्ध Quint.com, हरिभूमि, बदलाव, गाँव कनेक्शन, गाँव जवार समेत दर्जनों वेबसाइट्स और पत्र-पत्रिकाओं ने भी अजय कुमार की तस्वीरों की श्रंखला प्रकाशित की है. कोसी के इस शानदार शख्सियत को जाने बिना शायद आप पूरी कोसी को नहीं जान पायेंगे, क्योंकि जब भी बिहार का शोक कहे जाने वाले कोसी की गोद में बसे लोगों का वास्तविक दर्द आप जानना चाहेंगे तो फिर इनकी तस्वीरें ही आपको सच्चाई से रूबरू करा सकती हैं.

जानें फोटोजर्नलिस्ट अजय कुमार को: 02 अक्टूबर 1958 को जन्मे और दर्जनों अखबारों में बतौर जर्नलिस्ट रह चुके करीब 58 वर्षीय अजय कुमार सहरसा जिले के सिमरी बख्तियारपुर के रहने वाले हैं. कलम की ताकत का अनुभव कर चुके अजय छात्र जीवन से ही पत्रकारिता के शौकीन रहे हैं. पढ़ाई के दौरान ही सबसे पहले वर्ष 1983 में ये बेगुसराय टाइम्स से जुड़े और फिर अपने गृह शहर सिमरी बख्तियारपुर से ही इन्होने अपने पत्रकारिता के 33 साल के कैरियर में आत्मकथा (दैनिक), प्रभात खबर (रांची एडिशन), पाटलिपुत्र टाइम्स, आर्यावर्त, प्रदीप, जनशक्ति, हिन्दुस्थान न्यूज एजेंसी (HS), नवभारत टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान आदि के लिए अपनी सेवा समर्पित कर दी.

अपमानित होना साबित हुआ टर्निंग प्वाईंट: एक कहावत है कि मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूर-ए-खुदा होता है. मधेपुरा टाइम्स के कार्यालय में एक ख़ास इंटरव्यू में अजय कुमार का वो दर्द भी उभर कर सामने आ जाता है जो उनके पत्रकारिता के कैरिअर का टर्निंग प्वाईंट साबित हुआ. ये बताते हैं कि वर्ष 1992 में ये दैनिक हिन्दुस्तान से दिल से जुड़े थे और लगातार 21 साल इस अखबार के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर दिया. पर 2013 में स्थानीय मोडम प्रभारी के द्वारा उन्हें अपमानित किये जाने के बाद इन्होने इस अखबार को छोड़ दिया. अजय कहते हैं कि तनाव में काम छूटा तो उसी समय सोशल मीडिया की तरफ झुकाव बढ़ा और दिल बहलाने के लिए जब फेसबुक तथा अन्य जगहों पर अपनी कोसी के दर्द की तस्वीरें और आलेख आदि पोस्ट करनी शुरू की तो सोशल मीडिया के यूजर्स ने अजय को पलकों पर बिठा लिया. इंटरनेट पर दुनियां से जुड़े तो विभिन्न प्रकार की ख़बरों और पोस्ट की गई तस्वीरों ने इन्हें और निखारना शुरू किया. लोगों की टिप्पणियाँ मनोबल बढ़ाती चली गई और फिर इनकी तस्वीरों के माध्यम से देश और दुनियां ने न सिर्फ इस इलाके के पिछड़ेपन को देखा बल्कि बीबीसी जैसी दुनियां की प्रतिष्ठित न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एजेंसी ने भी सरकार की आँखें अजय कुमार की तस्वीरों के माध्यम से ही खोलने का प्रयास किया.
    निर्भीक और ईमानदार पत्रकारिता करने वाले अजय कुमार की लगभग सभी तस्वीरें कोसी के ग्रामीण जनजीवन से जुड़ी हुई रहती है, जो इनके प्रिय आंचलिक कथाकार फनीश्वर नाथ रेणु के उपन्यासों से प्रभावित दीखती है. वर्तमान में प्रभात खबर के लिए बतौर फोटोजर्नलिस्ट काम कर रहे अजय कुमार की कई तस्वीरें तो इतनी मार्मिक होती है कि संवेदनशील लोगों को विचलित करने के लिए काफी है. कहते हैं बिना थके फोटोजर्नलिज्म के लिए तो मेरी जिन्दगी ही समर्पित है.
    तस्वीरें यह भी बताने के लिए काफी है कि भले ही शहरें डिजीटल हो रहे हों, पर गांवों के लाखों परिवार को आज भी न तो बदन ढंकने के लिए पूरा वस्त्र है और न खाने के लिए दो जून की रोटी.
    अजय कुमार की बोलती तस्वीरें बरबस अदम गोंडवी की चर्चित दो पंक्तियाँ फिर से याद दिला जाती हैं:
“तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है.”
(Report: R.K.Singh)

[अजय कुमार की तस्वीरों की ताजा श्रंखला मधेपुरा टाइम्स के फेसबुक पेज पर भी 'मेरी तस्वीर ही पहचान है' के रूप में उपलब्ध है,देखने के लिए यहाँ क्लिक करें]

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