संवाददाता/20/11/2012
छठ के घाटों पर उमड़ी भीड़ और दिमाग पर आस्था का असर
इतना कि लोग इस दौरान अपने बाल-बच्चों को भी भूल जाते हैं. खैर मनाइए कि भीड़ वाले
बड़े घाटों जैसे कि मधेपुरा के भिरखी पुल के घाट पर लाउडस्पीकर से ‘अनाउंसमेंट’ की व्यवस्था होती है वर्ना खोये
बच्चे शायद मुश्किल से ही मिल पाए.
कल
शाम से आज सुबह तक श्रद्धालु भक्ति रस में ऐसे डूबे कि अपने करीब आधा दर्जन बच्चों
को भूल गए. भटकते बच्चों को किसी ने ‘अनाउंसमेंट काउंटर’ तक पहुंचा दिया. लाउडस्पीकर से जब बच्चे की पहचान की घोषणा
हुई तो लोग वहां आकर अपने बच्चे को ले गए. पर आज सुबह बच्चे खोने का एक अलग किस्म
का वाकया हुआ. एक काली पैंट और पीली शर्ट पहने बच्चे को किसी ने भटकता देख
अनाउंसमेंट काउंटर पर पहुंचा दिया. व्यवस्थापक उत्तम टेंट हॉउस के द्वारा घंटों
आवाज लगाई गयी पर कोई इस बच्चे को लेने आ नहीं रहा था. सभी हैरत में थे कि आखिर
कौन सी ऐसी परिस्थिति हुई कि इस बच्चे को लेने कोई नहीं आ रहा. बच्चे तो बच्चे
होते हैं. इस दौरान बच्चा मस्ती से मिठाई खाता रहा.
करीब
एक घंटे बाद अचानक एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया और बच्चे से लिपट गया. बच्चे का पिता
गणेशस्थान के अरूण यादव से पूछने पर पता चला कि जब वे छठ के घाट से घर गए तो बौआ
को नहीं पाकर यहाँ दौड़ते आये हैं. यानी कि घाट से चलने के समय या फिर रास्ते में
अरूण बाबू ने नहीं देखा कि वे जितने बच्चे घाट पर लाये थे उतने ले जा रहे हैं या
नहीं !
आस्था में ऐसे डूबे कि खुद पहुँच गए घर बच्चा रह गया घाट पर
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
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November 20, 2012
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