भूटान-भारत अंतर्राष्ट्रीय साहित्य- सांस्कृतिक मैत्री सम्मेलन ( 17-22 सितंबर 2026 )के तहत आयोजित साहित्य यात्रा में सम्मिलित डा० शांति यादव द्वारा सम्मेलन में प्रस्तुत दो गंभीर एवं प्रासंगिक ग़ज़लों की गूंज ने श्रोताओं को मुग्ध कर लिया-
घरों में ठंडे ये चूल्हे,खाली
हंडी देखिए
भूख की वहशी इमारत की बुलंदी देखिए।
उम्र भर फेंका किए जो जाल हर तालाब में
उन मछेरों के गले माला औ कंठी देखिए।
और दूसरी ग़ज़ल का एक शेर ----
गो हमें हर मोड़ पर डंसने लगी हैं कुर्सियां
ख्वाब सी हर आंख में बसने लगी हैं कुर्सियां।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात साहित्यकार डा० सारंगा कर रही थीं। भूटान ब्राड कास्ट के पदाधिकारी हरि मनका राय मुख्य अतिथि तथा भूटान के हिन्दी कवि- साहित्यकार अच्युत धीमेर विशिष्ट अतिथि के रूप में मंच पर उपस्थित थे। साथ ही भारत के कई समर्थ साहित्यकार भी मंच को सुशोभित कर रहे थे।सम्मिलित रूप से डा० शांति यादव को सम्मानित करते हुए मोमेंटो व सम्मान-पत्र प्रदान किया गया।
डा० यादव पूर्व में बिहार सरकार द्वारा "साहित्य सेवा सम्मान" भारतीय दलित साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा "वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान " के अलावा ढेर सारे सम्मानों से विभूषित की जा चुकी हैं। विदेशी धरती पर उन्हें चाइना और दुबई में भी साहित्यिक सम्मान से नवाजा जा चुका है।उनकी आठ एकल पुस्तकें प्रकाशित हैं। "चुप रहेंगे कब तलक " (ग़ज़ल- संग्रह) तथा "वैदेही का अंतर्द्वंद्व " (खंडकाव्य) इनकी बहुचर्चित पुस्तकें हैं जिनपर भारत के विभिन्न शहरों में समीक्षात्मक संगोष्ठी आयोजित हो चुकी है।
मधेपुरा, बिहार के कवियों, साहित्यकारों तथा साहित्यप्रेमियों की ओर से डा० यादव को ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं प्रेषित की गई हैं । मधेपुरा ही नहीं,पूरा बिहार डा० शांति यादव की साहित्यिक उपलब्धियों से गौरवान्वित है।
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
on
September 27, 2026
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