11 जून 2017

पुनीता सिंह: मधेपुरा की बेटी मिथिला पेंटिंग को देश की राजधानी में बना रही लोकप्रिय

मधेपुरा की धरती पर पले-बढ़े कई ऐसे लोग ऐसे हैं जो महानगरों में भी रखकर अपनी सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी यादों को जिन्दा रखने के प्रयास में हैं. जाहिर है, ऐसे लोग न सिर्फ बाहर बल्कि अपने घर में प्रशंसा के पात्र होते हैं.

मधेपुरा की ऐसी ही एक बेटी दिल्ली में रहकर मिथिला की धरोहर कला ‘मिथिला पेंटिंग’ में न सिर्फ खुद महारथ हासिल कर रही है बल्कि इस अद्भुत विधा को महानगर में भी लोकप्रिय बना रही है.

मधेपुरा जिले के बिहारीगंज प्रखंड के मोहनपुर की मूल निवासी पुनीता सिंह के द्वारा लगाए जा रहे प्रदर्शनी दिल्ली में लोगों को खूब भा रहे हैं और मिथिला पेंटिंग्स की कलाकारी लोग खरीदकरअपने घरों को सजाने भी ले जा रहे हैं. अपनी संस्कृति और सभ्यता को सबसे ऊपर स्थान देने वाली पुनीता सिंह बी. एन. एम. यू. के मैथिलि के प्राध्यापक डॉ. राम नरेश सिंह और गृहिणी श्रीमती मीरा सिंह की पुत्री हैं. पुनीता सिंह ने एम एल टी कॉलेज सहरसा से बायोटेक से ग्रैजुएशन और बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से पोस्ट ग्रैजुएशन कर दरभंगा से बी.एड. और एम. एड. की पढ़ाई की है. पर अपनी संस्कृति के प्रति पिता से प्रेरित होकर बचपन से ही मिथिला पेंटिंग के प्रति आकर्षण में बंधी पुनीता ने इसके बाद इसमें कुछ करने के लिए दरभंगा रहना उचित समझा
और यहाँ गुरु श्री भगवान् ठाकुर की ‘संस्कृति’ संस्था में पुनीता ने मिथिला पेंटिंग की ट्रेनिंग लेनी शुरू की. कहते हैं यदि किसे काम में रुचि हो तो उसमें बेहतर सीखा जा सकता है. और फिर पुनीता के इस शौक को निखारने में अपने घर के साथ ससुराल (सहरसा जिले के सरडीहा) के लोगों ने भी भरपूर साथ दिया. बैंक अधिकारी रहे श्वसुर अरूण कुमार सिंह और स्किल इंडिया से जुड़े अधिकारी पति ऋषि कुमार सिंह के प्रोत्साहन से दिल्ली में रह रही पुनीता आज न सिर्फ महिलाओं को इसकी ट्रेनिंग दे रही है बल्कि इस क्षेत्र में नए प्रयोग भी लोगों को खूब भा रहे हैं. दिल्ली में जहाँ पुनीता रहती हैं वहां रह रहे पंजाबियों में भी इसके प्रति काफी आकर्षण पैदा हुआ है. चाचा पत्रकार संजय परमार भी बताते हैं कि बचपन से ही पुनीता को मिथिला की संस्कृति और संस्कार के प्रति गहरा आकर्षण था और वह कुछ अलग ऐसा करना चाहती थी जो यहाँ की संस्कृति से जुड़ा हो.

मधेपुरा टाइम्स से बातचीत में पुनीता इस विधा पर कई ऐसी जानकारी देती हैं जो मिथिला और मधुबनी पेंटिंग की खाशियत और इसकी लोकप्रियता की वजह मानी जा सकती है. कहती है ‘कचनी’ इस पेंटिंग में ख़ासा महत्त्व रखता है. कपड़ों, परदों, टेबुल क्लॉथ और बर्तनों आदि पर ही नहीं अब वे कंघियों पर पर इस पेंटिंग का इस्तेमाल कर रही हैं. दिल्ली हाट में पुनीता सिंह की हाल में लगाईं प्रदर्शनी ने खूब लोकप्रियता बटोरी थी.

पुनीता बताती है कि इसका सबसे पुराना रूप पहले के कोहवर घरों में देखा जा सकता था. शौक के रूप में मिथिला पेंटिंग ही क्यों, के प्रश्न पर कहती हैं कि अपनी कोसी और मिथिला की संस्कृति के गौरवशाली विरासत को बचाने का प्रयास हर किसी को करना चाहिए. वैसे भी ये कला घर की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में भी कारगर साबित हो सकती है. मिथिला पेंटिंग को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने का सपना रखने वाली पुनीता सिंह कहती है कि जल्द ही वे सहरसा और मधेपुरा में भी महिलाओं को मिथिला पेंटिंग की ट्रेनिंग देने के लिए उपस्थित होंगी ताकि अपने इलाके में भी इसकी खुशबू असरदार ढंग से बिखर सके.  
(वि. सं.)

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