14 नवंबर 2016

स्पेशल रिपोर्ट: मधेपुरा में भी है एक ‘शिरडी’ जहाँ है साईं बाबा का भव्य मंदिर

किसी दशक में कुख्यात डकैतों के गाँव कहे जाने वाले मधेपुरा जिले के एक छोटे से गाँव में इन दिनों धर्म और अध्यात्म की गंगा बहती दिखाई दे रही है.
कुछ दशक पहले जहाँ इस गाँव में अक्सर गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी वहीँ अब भजन-कीर्तनों का दौर चल रहा है. हैरत की बात तो ये भी है कि संभवत: बिहार का सबसे बड़ा साईं मंदिर भी यहाँ बनकर तैयार है जहाँ लोगों की भीड़ उमड़ने लगी है.
    जी हाँ, हम बात जिले के कुमारखंड प्रखंड के टेंगराहा परिहारी पंचायत अंतर्गत टेंगराहा गाँव की ही कर रहे हैं.  मधेपुरा जिला मुख्यालय से महज 22 किलोमीटर दूर यहाँ नया बनकर तैयार ‘शिरडी वाले साईं बाबा’ के मंदिर में घुसते ही कुछ अलग एहसास होने लगता है. साईं की मूर्ति इतनी भव्य मानो अब कुछ बोल उठेंगे. वैसे करीब 7 हजार की आबादी वाले टेंगराहा परिहारी पंचायत के इस गाँव के इस विशाल मंदिर परिसर ‘देवेन्द्र धाम’ में घुसने के साथ ही भक्तिमय माहौल दिखने लगता है.  सामने तीन मंजिला विशाल मंदिर है जिसके निचले तल्ले पर महावीर मंदिर है जिसमें लोग बजरंगबली की पूजा करते हैं तो उससे ऊपर के तल्ले पर योगेश्वर श्रीकृष्ण मंदिर अवस्थित है. यहाँ भक्त भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा करते नजर आते हैं. उससे ऊपर अर्धनारीश्वर हैं, यानि आधा शिव और आधा पार्वती. अर्धनारीश्वर एक विशाल शिव लिंग के रूप में है जो 1008 बिलकुल ही छोटे शिवलिंग की आकृति से बना हुआ है. लोग कहते हैं कि इसपर जल चढ़ाने से आप एक बार में ही 1008 शिवलिंगों पर जल चढ़ा लेते हैं जो कि अत्यंत शुभ और मनोकामनापूर्ण माना जाता है. उससे भी ऊपर के तल्ले पर ईश्वर का ‘निराकार’ रूप मौजूद है. परिसर के साईं मंदिर को मिलाकर देखा जाय तो यहाँ चारों युग यानि सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के देवता की मौजूदगी है.
    इस भव्य मंदिर के सबसे उपरी तल्ले पर जब आप जाते हैं तो काफी दूर तक गाँव और खेतों का नजारा देखने को मिलता है. हमें एक भवन को दिखाकर बताया गया कि वो पूर्व डकैतों के मुख्य धारा में आने पर उनके पुनर्वास के लिए बनाया गया है.
    इन मंदिरों का निर्माण वर्ष 1997 में गाँव के ही दिगंबर प्रसाद यादव, श्यामल किशोर यादव, जय प्रकाश नारायण और ओम प्रकाश यादव ने मिलकर करवाया था. जबकि परिसर में ही मौजूद ‘ऊँ साईं मंदिर’ का निर्माण भी इनके द्वारा ही करवाया गया है और तकनीकी सलाहकार मधेपुरा के ही ई० महेंद्र नारायण मंडल और मुख्य कार्यकर्ता सतन यादव हैं. साईं की ‘बोलती’ प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा इसी 06 जुलाई 2016 को हुआ है. ऊँ साईं मंदिर के बरामदे पर बैठकर ध्यान करने पर असीम शान्ति का एहसास होता है. कहते हैं कि साईं जात-पात और धर्म के बंधन में कभी नहीं बंधे और इस मंदिर की भी एक और खासियत यह है कि जात-पात से ऊपर उठकर यहाँ आपको पूजा के दौरान फूल, पानी आदि उपलब्ध करने के लिए एक दलित महिला अंजुला देवी मंदिर में रहती हैं.

मंदिर निर्माण के दौरान कई अद्भुत बातों की चर्चा: ग्रामीणों की मानें तो मंदिर निर्माण के दौरान स्थल पर कंधे पर कम्बल रखकर आए एक मुस्कुराते अज्ञात व्यक्ति ने खुद के हरिद्वार से आने की बात कही थी. बगल में एक बड़ा चबूतरा बने होने के बावजूद वह शख्स खाली जगह पर लेट गया था और कुछ देर बाद खोजने पर वह नहीं मिले थे. जहाँ उनके स्मरण में एक नीम का पेड़ लगा दिया गया है. हवन कुंड में आदमी के पैर के निशान होने, पर राख के एक भी निशान अगल-बगल नहीं मिलने को भी लोग आस्था से जोड़कर देखते हैं और मानते हैं कि यहाँ साईं बाबा का आगमन रहा होगा. मंदिर का निर्माण करवाने वाले दिगंबर प्रसाद यादव कहते हैं कि शिरडी जाने पर उन्हें यहाँ भी मंदिर बनवाने की प्रेरणा मिली थी. शिरडी का संस्मरण सुनाते वे कहते हैं कि अँधा सा दिखने वाले एक व्यक्ति ने पीछे से उनके कंधे पर हाथ रखकर आगे बढ़ने को कहा था और जब उन्होंने मन में ही ये सोचा कि शायद ये व्यक्ति अँधा है तो वह कम्बल लिया शख्स अचानक बोल बैठा कि वह अँधा नहीं है. कई चमत्कारों ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अब खुद को इस मंदिर में साईं के चरणों में समर्पित कर दिया.

कैसे पहुंचे मंदिर तक?: साईं मंदिर तथा चारों युगों के देवताओं के एक साथ दर्शन के लिए आप मधेपुरा जिला मुख्यालय या सिंहेश्वर से बिलकुल आराम से जा सकते हैं. मधेपुरा से डॉ. उजित राजा के नए क्लिनिक के सामने से जाने वाली पक्की सड़क से तुलसीबाडी होते हुए बेलाड़ी चौक पहुंचे और वहां से बाईं तरफ मुड़कर बसंतपुर के बाद आपको इस मंदिर से दर्शन हो सकते हैं. सिंहेश्वर से भी आप बेलाड़ी होते हुए यहाँ करीब आधे घंटे में आ सकते हैं.
     तो फिर क्यूं न एक बार मधेपुरा के इस ‘शिरडी’ के दर्शन कर लें !
(वि.सं.)

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