02 जनवरी 2013

दामिनी हम शर्मिन्दा है///आनंद मोहन(पूर्व सांसद)

जाता हुआ गुजरता साल,
अंतस में भर गया मलाल ?
दिग-दिगन्त में उठा बवाल
छोड़ गई वह कई सवाल
यह किस्मत की रेखा है,
या सारा सिस्टम धोखा है?

कहाँ गया वह आह्वान ?
नारी का वन्दन-पूजन
कैसी संस्कृति और परम्परा ?
भगिनि के प्रति है, कलुष भरा
तुम तो सिस्टम से हार गई
हम सबको जिन्दा मार गई।

शर्म है भाई होने पर
अपनों से तुझको खोने पर
ऊपर-ऊपर सब सहते हैं
अन्दर से आँसू बहते हैं
हम सबने तुझको मारा है
शैतान से इंसा हारा है।

हम हैं तेरे गुनहगार,
पर हैं, आगे से होशियार
दरिन्दों के दाँत हम तोड़ेंगे
संकल्प उसे ना छोड़ेंगे
दामिनी हम शर्मिंदा है
कातिल तेरे जिन्दा हैं।

हमें जगा तुम चली गई
चर्चा है तेरी गली-गली
संकल्प हमारा है अंतिम
व्यवस्था बदलेंगे सड़ी-गली
जिसने खून की अरमानों का
कुचलेंगे सर शैतानों का।
माँ मैं जीना चाहती हूँ,
पापा से मिलना चाहती हूँ
भाई संग खेलना चाहती हूँ
सखियों संग हंसना चाहती हूँ
आखिर में तेरा यह कहना
भूलेंगे नहीं कभी बहना
मर्मों को छूती ये भाषा,
तेरे साहस की परिभाषा।

तुम हम सब से रूठ गई
रिस्तों की डोरी टूट गई
पर याद रहेगी तू बहना
तिल-तिलकर तेरा दुःख सहना
है कसम, कभी ना भुलाएंगे
हब्सी को सबक सिखायेंगे।

यह मातमपुर्सी, शब्दजाल
किसको रहता, कितना ख्याल
इसके पहले कि भृकुटि तने
कोई कोमलांगी काली बने
दामन फिर खून से नहीं सने
अविलम्ब कड़ा कानून बने।

बने सख्त कानून, कोई
बहशी न फूल मसल पाए,
पर हम रहें सर्तक, कोई
दुरूपयोग न इसका कर पाए।
  
- आनंद मोहन
   31.12.2012
 मंडल कारा, सहरसा

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