यह
दुनिया मायावी और विचित्र ही है जहाँ किसम-किसम के प्राणियों के बीच आदमियों की भी
कई प्रजातियां हैं जो पूरे संसार को धन्य कर रही हैं। बात हमारे गाँव-शहर या इलाके
की हो या फिर महानगरों की। हर कहीं हर प्रकार के लोग पाए जाते हैं। कहीं कम,
कहीं अधिक।
पर
आजकल जिस किसम के लोग हमारे सामने तादाद बढ़ाते जा रहे हैं उसे देखकर तो यही लगता
है कि हम पर किसी का कोई अनुशासन ही नहीं रहा। न घर-परिवार का, न गुरुजनों का, और न ही समाज का। मर्यादाहीनता के इस भयानक दौर में हम
अनुशासनहीनता की सारी सीमाएँ लांघ कर इतने निरंकुश, स्वच्छन्द, स्वेच्छाचारी और उन्मुक्त हो चले हैं कि अब हमें किसी लक्ष्मण रेखा में
बाँधना शायद बहुत बड़ा मुश्किल काम हो गया है।
प्रौढ़,
बुजर्गों और अनुभवी लोगों को छोड़
दिया जाए तो आज की युवा पीढ़ी की पूरी जिन्दगी ही ऐसी हो गई है कि जिसे देख कर
ग्लानि और हीनता का अनुभव होता है हमारे भविष्य का अनुमान लगा कर। हालांकि इसके
लिए जितनी संस्कारहीनता जिम्मेदार है, उतने ही हम भी। क्योंकि हमने
भी अपनी सारी मानवता को भुलाकर सामाजिक व्यवस्थाओं और मर्यादाओं का चीरहरण करने में कहीं कोई कसर बाकी
नहीं रखी है।
आज
की पीढ़ी जो कुछ सीख पायी है उसमें हमारा दोष भी सर्वाधिक है क्योंकि जो सामने
परोसा जाता है उसी के स्वाद को लेकर हर कोई जिज्ञासु रहता है। पर हम अब सुधर पाने
की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि पक्के घड़े हो गए हैं जिस पर शायद ही कोई रंग लग
सके।
मौजूदा
दुरावस्था के लिए हमारे स्वार्थ और समझौते जिम्मेदार हैं जिनकी वजह से हमने
सिद्धान्तों को छोड़ा, आदर्शों
से किनारा कर लिया और नैतिक मूल्य तक दाँव पर लगा दिए। और वे भी किसलिए, सिर्फ और सिर्फ अपनी वाहवाही कराने या अपने
नाम से माल बनाने।
इन
परिवेशीय हालातों में अंकुरित और पल्लवित नई पीढ़ी को न संस्कारों की खाद मिल पायी,
न स्वस्थ विकास के लिए जरूरी आबोहवा।
मिला सिर्फ प्रदूषित माहौल और नकारात्मक भावभूमि। आज का युवा अधिकतर मामलों में
नकारात्मक मानसिकता के साथ जीने लगा है। उसे दूर-दूर तक कहीं कोई रोशनी की किरण
नज़र नहीं आ रही।
वर्तमान
को आनंददायी और विलासिता प्रधान बनाने के भोगों में अपने आपको इतना लिप्त कर लिया
है कि हमने भविष्य के बारे में कभी कुछ सोचा ही नहीं। जो सायास-अनायास मिलता गया,
जो हड़पा गया और जो हराम का मिलता गया,
उसी में मदमस्त होते हुए हमने
वर्तमान का चरम उपभोग अपने हक़ में इस तरह कर लिया है कि हमारी दूरदर्शिता और
संवेदनशीलता पूरी तरह मर चुकी है और हम भोगवादी मानसिकता के शिकार होकर पूरे
समर्पण के साथ चार्वाक मतानुयायी हो चले हैं।
हमारे
लिए ऋषि-मुनि, तपस्वी और
महापुरुष नहीं बल्कि वे लोग आदर्श हो गए हैं जिनमें संसार भर की सारी बुराइयां भरी
पड़ी हैं, आदमियत खो चुके हैं
और जमाने भर को खा जाने के स्वार्थों में लिप्त हैं। हमने उन्हें तहेदिल से
स्वीकारा भी है और उनका अनुकरण भी किया है क्योंकि हम भी हराम की झूठन का रस पाने
और किसी भी कीमत पर परायी झूठन चाटते रहकर आगे बढ़ने के हर मौके को भुनाना सीख गए
हैं।
ये
सारी स्थितियाँ हमारे लिए भले ही त्रासदायी न हों, लेकिन हमारी युवा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे
अच्छा नहीं कहा जा सकता। हालात भयावह होते जा रहे हैं, हमें इसका अंदाजा नहीं लग पा रहा है क्योंकि हमारी
बुद्धि परायी झूठन खा-खाकर भ्रष्ट हो चुकी है। आज युवाओं के सामने भविष्य निर्माण
की अस्मिता का संकट है। दूर-दूर तक न ताजगी भरी हवाएं महसूस हो रही हैं, न किसी सूरज की चमकती रोशनी या चांद की
शीतलता। कलेजे से लेकर क्षितिज तक भागदौड़ के सिवा कुछ नहीं है।
मैकाले
ने हमें कहीं का रहने नहीं दिया है। न हमारे भीतर पुरखों का गौरव है, न परंपरागत ज्ञान, सभ्यता और संस्कृति का गर्वाभिमान, और न ही कोई हुनर जिसके बूते हम दुनिया को
कुछ दे सकें। जहाँ थोड़ा-बहुत हुनर है, संभावनाएं हैं, वहाँ
अवसरों का टोटा है, प्रोत्साहन
पलायन कर चुका है और जो लोग कुछ देने की स्थिति में हैं वे सारे के सारे बंदरबाँट
में लगे हुए रेवड़ियां उछालने में लगे हुए हैं।
आखिर
ऐसे में युवाओं के सामने बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि करें तो क्या करें। जमाने
की ओर जिधर देखें वहाँ कुछ कदम चल चुकने के बाद आ धमकता है कोई बड़ा सा स्पीड़
ब्रेकर, और उल्टे पाँव फिर
वहीं लौटने को विवश होना पड़ता है जहाँ से डग भरने की शुरूआत की थी।
दिशाहीनता
की इस स्थिति में युवाओं की ऊर्जाओं का नकारात्मक दिशाओं की ओर मार्गान्तरण व
भटकाव होता जा रहा है। लक्ष्यहीनता के माहौल ने युवाओं को इतना दिग्भ्रमित करके रख
दिया है कि उन्हें सूझ ही नहीं पड़ रही कि करना क्या है, हो क्या रहा है, और आखिर उनका होगा क्या?
इनके
साथ ही संचार क्रांति के उपकरणों का बेजा इस्तेमाल आज चरम पर है। मोबाइल हर युवा
के हाथ में है। बल्कि यों कहें कि प्राईमरी स्कूल से ही बस्ते के साथ मोबाइल भी
बच्चों की जिन्दगी का अहम हिस्सा हो गया है जहाँ जी चाहे उतना बतियाने से लेकर
गाने सुनने, फिल्म देखने,
वीडियो का मजा लेने का शौक इतना
परवान चढ़ चुका है कि हम उसी में मस्त हैं, जमाने भर की सारी चिंताओं से हम दूर हैं ही, अपने भविष्य को लेकर भी इतने बेखबर कि हमें
जो आनंद पढ़ाई के बाद मिलना चाहिए था वह अभी से ही मिलना शुरू हो गया है, फिर पढ़ाई का क्या अर्थ रह गया है।
किसी
जमाने में गुरुकुलों में रहने वाले या कि दो-तीन दशकों से पहले तक साधन-सुविधाओं
के अभाव में जीते हुए पढ़ाई करने वाले बच्चों में ‘सुखार्थिन कुतो विद्या, विद्यार्थिन कुतो सुखम्’ के भावों के साथ जीवन निर्माण की परंपरा बनी हुई थी।
और ऐसे में जो पीढ़ियाँ हाल के वर्षों में नाम कमा पायी हैं, वैसा शायद अब संभव नहीं।
अब
हमारे युवाओं की शारीरिक स्थिति भी ऐसी नहीं रही है कि कुछ डगर पैदल भी चल सकें।
सभी को स्कूटर या बाईक चाहिए। फिर चाहे स्कूल जाना हो या एकाध किलोमीटर कहीं ओर।
बिना बाईक के हमारा जीवन ही थम जाता है। फिर बाइकिंग ऐसी कि हमें परवाह ही नहीं है
नियम-कानूनों की। जात-जात के तेज कानफोडू हॉर्न बजाते हुए हम जिस स्पीड़ से बाईकिंग
के आदी होते जा रहे हैं, उसे
देख लगता है कि हमारी खातिर आर्थोपैडिक डॉक्टरों की समृद्धि के जाने कितने द्वार
खुल गए हैं।
हमारे
प्रत्येक कर्म में अनुशासनहीनता चरम पर है और लगता है जैसे हम दुनिया भर का
भोग-विलास पूरे करने के लिए ही आये हैं, इसके सिवा हमारे जीवन का कोई मकसद नहीं है। आज का युवा
जहां कहीं मिलता है वह जोरों से चिल्लाना शुरू कर देता है। दूसरों की शांति भंग
करने वाले ऐसे लोग हर कहीं हैं। जिन युवाओं को अच्छी जगह स्थापित होना चाहिए वे आज
सर्कलों, चौराहों, पेढ़ियों और बुरी जगहों पर जमा होने के आनंद
को ही जीवनानंद समझ बैठे हैं।
इन
तमाम स्थितियों से हमें उबरना होगा। समाज की
प्रत्येक इकाई को अपने भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना होगा कि हम क्या कर
सकते हैं। वरना आज जो कुछ हो रहा है, दिख रहा है, वह
निराशा के सिवा कुछ नहीं है।
डॉ. दीपक आचार्य (9413306077)
मानसिक दौर्बल्य का शिकार है दिशाहीन युवा पीढ़ी
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
on
February 09, 2013
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