आवेदन में ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि वे स्वच्छ भारत मिशन अथवा स्वच्छता से जुड़ी योजनाओं के विरोधी नहीं हैं, बल्कि उनकी आपत्ति केवल प्रस्तावित निर्माण स्थल को लेकर है। उनका कहना है कि चयनित स्थल के आसपास करीब 100 से 150 मीटर की दूरी पर रिहायशी मकान, लगभग 100 मीटर की दूरी पर दो विद्यालय, मंदिर, होटल तथा अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान स्थित हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है, जहां प्रतिवर्ष करीब तीन फीट तक पानी जमा हो जाता है।
ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि भविष्य में किसी कारणवश संयंत्र के संचालन अथवा रखरखाव में तकनीकी समस्या आती है तो दुर्गंध, मच्छरों का प्रकोप, शोर-शराबा तथा स्लज ढोने वाले वाहनों की आवाजाही से स्थानीय लोगों, विद्यार्थियों एवं श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। आवेदन में नगर पंचायत से यह भी पूछा गया है कि स्थल का चयन किन तकनीकी मानकों के आधार पर किया गया, क्या अन्य वैकल्पिक स्थलों का सर्वेक्षण हुआ था तथा यदि हुआ तो उन्हें किन कारणों से अस्वीकार किया गया। साथ ही परियोजना की डीपीआर, साइट चयन रिपोर्ट, ले-आउट प्लान, पर्यावरणीय स्वीकृतियां, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति, भूजल संरक्षण, दुर्गंध नियंत्रण प्रणाली, ग्रीन बेल्ट योजना तथा संचालन एवं रखरखाव (O&M) से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराने की मांग की गई है। ग्रामीणों ने स्थानीय नागरिकों के साथ खुली बैठक अथवा जनसुनवाई आयोजित कर आवश्यक होने पर स्थल परिवर्तन पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह भी किया है।
'योजना अच्छी है, लेकिन रिहायशी क्षेत्र से दूर बने' : दिलीप कुमार
वार्ड संख्या-12 निवासी दिलीप कुमार ने कहा कि केंद्र और बिहार सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना स्वागत योग्य है, लेकिन इसका निर्माण घनी आबादी से दूर होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित स्थल के आसपास विद्यालय, होटल, भोजनालय, बस स्टैंड और रिहायशी इलाका है। उनका दावा है कि 2008 की कुशाहा त्रासदी के बाद बेंगा नदी मृतप्राय हो चुकी है और उसका जल प्रवाह लगभग समाप्त हो गया है। ऐसे में यदि यहां एफएसटीपी स्थापित होता है तो भविष्य में भूमिगत जल प्रदूषित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि सरकार को भूमि अधिग्रहण से पहले पूरे मामले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
'कम से कम एक किलोमीटर दूर बने संयंत्र' : विकास शर्मा
सोशल एक्टिविस्ट विकास शर्मा ने कहा कि कुशाहा त्रासदी के बाद बेंगा नदी में भारी मात्रा में सिल्ट जमा हो गई है और अब यह किसी बड़ी नदी से प्रभावी रूप से नहीं जुड़ती। उन्होंने सुझाव दिया कि जनहित को देखते हुए एसटीपी एवं एफएसटीपी प्लांट शहर की घनी आबादी से कम-से-कम एक किलोमीटर दूर स्थापित किया जाना चाहिए।
'तकनीकी खराबी हुई तो पूरे शहर पर पड़ेगा असर' : वार्ड पार्षद
वार्ड संख्या-12 के पार्षद शैलेंद्र कुमार ने कहा कि सरकार की
यह परियोजना शहर के लिए उपयोगी है, लेकिन इसे रिहायशी क्षेत्र के बेहद निकट स्थापित किया जा रहा है। यदि भविष्य में संयंत्र में तकनीकी खराबी आती है तो उसका प्रभाव केवल एक वार्ड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे शहर को इसका दुष्प्रभाव झेलना पड़ सकता है।
'पहले नदी का प्रवाह सुनिश्चित हो' : उपमुख्य पार्षद
नगर पंचायत के उपमुख्य पार्षद एवं वार्ड-12 निवासी श्यामा आनंद ने कहा कि शहर के लिए यह एक महत्वपूर्ण योजना है, लेकिन सबसे पहले मृतप्राय बेंगा नदी का पुनर्जीवन जरूरी है। उनका कहना है कि जब तक नदी में जल प्रवाह सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक इस प्रकार की परियोजना की उपयोगिता पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
'शहर की नालियां आपस में ही नहीं जुड़ी हैं' : सेवानिवृत्त प्राध्यापक
के पी कॉलेज, मुरलीगंज के सेवानिवृत्त प्राध्यापक एन.पी. यादव ने कहा कि नगर पंचायत क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था आज भी वैज्ञानिक और समेकित नहीं है। अधिकांश नालियां एक-दूसरे से जुड़ी ही नहीं हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अलग-अलग वार्डों का दूषित जल प्रस्तावित एसटीपी तक कैसे पहुंचेगा। उनके अनुसार यदि पहले संपूर्ण ड्रेनेज नेटवर्क विकसित नहीं किया गया तो संयंत्र का अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।
'सैटेलाइट मैपिंग के आधार पर हुआ है स्थल चयन' : कार्यपालक पदाधिकारी
नगर पंचायत के कार्यपालक पदाधिकारी अजय कुमार ने बताया कि परियोजना का उद्देश्य शहर के दूषित जल को बिना उपचार के नदी में जाने से रोकना है। सभी वार्डों से भूमिगत पाइपलाइन के माध्यम से नालियों का पानी एसटीपी तक लाया जाएगा, जहां उसका शुद्धीकरण कर निर्धारित मानकों के अनुसार नदी में छोड़ा जाएगा। वहीं, सेप्टिक टैंकों से निकाले जाने वाले मल-कीचड़ (फीकल स्लज) को भी विशेष वाहनों से एफएसटीपी तक लाकर वैज्ञानिक तरीके से उपचारित किया जाएगा, जिससे खुले में फेंके जाने से होने वाले प्रदूषण पर रोक लगेगी।
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| कार्यपालक पदाधिकारी |
उन्होंने बताया कि प्रस्तावित स्थल का चयन बिहार सरकार द्वारा नामित एजेंसी ने सैटेलाइट मैपिंग के आधार पर किया है। चयनित स्थल का निरीक्षण जिलाधिकारी द्वारा भी किया जा चुका है तथा लगभग 368.085 डिसमिल भूमि क्रय की प्रक्रिया चल रही है। स्थानीय लोगों की आपत्तियों पर उन्होंने कहा कि अब तक तीन बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं। फिर भी यदि लोगों की शंकाएं बनी हुई हैं तो उनके निराकरण के लिए एक और बैठक आयोजित की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि संयंत्र पूरी तरह बाउंड्रीवाल से घिरा होगा तथा आधुनिक मानकों के अनुरूप विकसित किया जाएगा, जिससे आसपास के क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
on
July 29, 2026
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