सुपौल- कोसी के जलस्तर में कमी दर्ज की जा रही है. नदी की जलस्तर में कमी आते ही कोसी तटबंध के भीतरी गांवों में कटाव तेज हो गया है. पहले जलस्तर वृद्धि में सुपौल के मरौना प्रखंड के कई बस्ती को कोसी ने अपने आगोश में समा लिया है.
कोसी नदी से विस्थापित परिवारों को प्रशासनिक स्तर पर समुचित व्यवस्था नहीं किये जाने से विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों में प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ काफी आक्रोश दिख रहा है.
कोसी की हेड और टेल भी अपनी: बिहार का शोक कहलाने वाली नदी की चित और पट यानि हेड और टेल दोनों अपनी होती है. कोसी जब उफान पर होती है तो उसकी तेज धारा कोसी तटबंध के भीतर बसे गांवों को बहाव के साथ ले जाती है. वहीं जब कोसी के जलस्तर में कमी आती है तो नदी की धारा में तेज करंट पैदा हो जाती है. देखते ही देखते नदी की करंट कच्चे और कमजोर पक्के मकानों को कटाव के साथ अपने धारा में समा लेती है. ऐसे में नाविक का नाव खेना भी खतरे से खाली नहीं होता है. नाविक अपने मन मुताबिक नाव को ले जाने में हमेशा अक्षम साबित होते हैं.
यूं कहें कि 15 जून से 15 नवम्बर तक बाढ़ अवधि में कोसी के तटबंध के भीतर बसे गांवों के लोगों को नदी के पानी घटने और बढने दोनों स्थिति में जिंदगी का जंग जीतने की चुनौती रहती है.
सुपौल जिले के 06 प्रखंडों के 36 पंचायत क्षेत्र व 130 गांव अब तक बाढ अवधि के शुरूआती दौर में तबाह हो चुके हैं. बता दें कि कोसी अपनी दिशा बदलने वाली नदियों में भी शुमार है जिसकी दिशा हर वर्ष बदलती है और कोसी वासियों पर कहर बरपाती है.
सरकार द्वारा कोसी व पीड़ितों को समस्या के निदान के संबंध में कई बार बड़े-बड़े आश्वासन दिये गये हैं, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गयी है, जिस कारण हर वर्ष विस्थापन का दंश झेलना कोसी पीड़ितों की नियति बन चुकी है.
कोसी नदी से विस्थापित परिवारों को प्रशासनिक स्तर पर समुचित व्यवस्था नहीं किये जाने से विस्थापन का दंश झेल रहे लोगों में प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ काफी आक्रोश दिख रहा है.
कोसी की हेड और टेल भी अपनी: बिहार का शोक कहलाने वाली नदी की चित और पट यानि हेड और टेल दोनों अपनी होती है. कोसी जब उफान पर होती है तो उसकी तेज धारा कोसी तटबंध के भीतर बसे गांवों को बहाव के साथ ले जाती है. वहीं जब कोसी के जलस्तर में कमी आती है तो नदी की धारा में तेज करंट पैदा हो जाती है. देखते ही देखते नदी की करंट कच्चे और कमजोर पक्के मकानों को कटाव के साथ अपने धारा में समा लेती है. ऐसे में नाविक का नाव खेना भी खतरे से खाली नहीं होता है. नाविक अपने मन मुताबिक नाव को ले जाने में हमेशा अक्षम साबित होते हैं.
यूं कहें कि 15 जून से 15 नवम्बर तक बाढ़ अवधि में कोसी के तटबंध के भीतर बसे गांवों के लोगों को नदी के पानी घटने और बढने दोनों स्थिति में जिंदगी का जंग जीतने की चुनौती रहती है.
सुपौल जिले के 06 प्रखंडों के 36 पंचायत क्षेत्र व 130 गांव अब तक बाढ अवधि के शुरूआती दौर में तबाह हो चुके हैं. बता दें कि कोसी अपनी दिशा बदलने वाली नदियों में भी शुमार है जिसकी दिशा हर वर्ष बदलती है और कोसी वासियों पर कहर बरपाती है.
सरकार द्वारा कोसी व पीड़ितों को समस्या के निदान के संबंध में कई बार बड़े-बड़े आश्वासन दिये गये हैं, लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गयी है, जिस कारण हर वर्ष विस्थापन का दंश झेलना कोसी पीड़ितों की नियति बन चुकी है.
(कोसी के कहर का वीडियो देखें, यहाँ क्लिक करें )
चित और पट दोनों कोसी की: बाढ़ अवधि के शुरूआती दौर में ही कोसी का कहर प्रारंभ (एक्सक्लूसिव वीडियो)
Reviewed by मधेपुरा टाइम्स
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July 19, 2016
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