पत्रकारिता का गिरता स्तर: जिम्मेवार कौन?(भाग-1)

पत्रकारिता: अल्पज्ञानी और दिग्भ्रमितों ने किया बेड़ा गर्क
            पत्रकारिता की दुनियां भी बड़ी अजीब है.यहाँ आइटम और वेराइटी की कोई कमी नहीं है.पहले तो ऐसा महसूस होगा कि पत्रकार महोदय से बड़ा बुद्धिजीवी कोई नहीं होगा.लेकिन जुबां खुलते ही पोल भी खुल जाती है.इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पत्रकारिता में अल्पज्ञानी और दिग्भ्रमितों की जमात बढ़ती ही जा रही है.यह हाल केवल जिले का ही नहीं बल्कि संपादक स्तर पर मौजूद लोगों का भी है.
           कोसी के इस इलाके में एक कहावत बड़ी प्रचलित है लाचारी का दाल खेसारी.बतलाना प्रासंगिक होगा कि कभी इस इलाके में दाल की किस्म खेसारी का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था लेकिन बाद में जब इस बात की वैज्ञानिक पुष्टि हुई कि खेसारी दाल खाना सेहत के लिए हानिकारक है तो उसका उत्पादन बंद कर दिया गया. कहने का मतलब यह कि कोई अन्य विकल्प नहीं है तो खेसारी चलेगा.दुखद पहलू यह है कि पत्रकारिता जैस गंभीर पेशा अब खेसारीलालों की जमात बन कर रह गया है.
            खेसारीलाल कहने की हिमाकत बड़ी जिम्मेवारी के साथ कर रहा हूँ. एक पत्रकार की हैसियत से जो कुछ देखा और महसूस किया हूँ, उस आधार पर कहा जा सकता है कि इस पेशे में जबरदस्त गिरावट दर्ज हुई है.कारण स्पष्ट है कि कल तक स्कूल और कॉलेज में सबसे पिछले बेंच पर बैठने वाला शख्स आज जिले में ब्यूरो चीफ अथवा डेस्क पर उप-संपादक बना बैठा है.मजे की बात यह है कि इनमे से कई मैट्रिक से लेकर स्नातकोत्तर तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं.कई लोग तो खुद को विश्वविद्यालय का टॉपर भी बतलाते हैं.विश्वविद्यालय की विश्वसनीयता पर संदेह उठाना जल्दीबाजी होगी लेकिन ऐसे तथाकथित टॉपरों की बौद्धिक क्षमता देखते हुए उनके डिग्री की निष्पक्ष जांच की जरूरत महसूस हो रही है.
            समस्या यह है कि जो लोग इस पेशे से जुड़े हुए हैं उन्होंने इसे बतौर कैरियर के रूप में नहीं लिया है.भाई साहब की जब सरकारी नौकरी की उम्र बीत गयी और बौद्धिक क्षमता पर पूरी तरह प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया तो जुगाड़ तकनीक के सहारे मीडियाकर्मी बन गए.चूंकि आदर्शवाद और नैतिकता का सारा ठेका इन्हीं के पास होता है इसलिए अपने काले अतीत को ढंकने के लिए भ्रमजाल फैलाना इनकी मजबूरी होती है.दिग्भ्रमित तो ऐसे अल्पज्ञानी इतने होते हैं कि अपनी लेखनी कि वजह से कई बार उपहास का पात्र भी बन जाते हैं.ऐसा नहीं है कि इस पेशे में अच्छे लोग नहीं है, लेकिन उन्हें ढूंढ निकलना मृग मरीचिका ही साबित होगी.
            पत्रकारों ने ही पत्रकारिता पेशे का बेड़ा गर्क कर रखा है.क्यों और कैसे, ये आगे भी बतलायेंगे.सबसे बड़ी बिडम्बना जो इनके साथ जुड़ी है वह यह है कि दूसरों को आइना दिखने वालों को अपना चेहरा आईना में देखना गंवारा नहीं है.झूठी शान, बिगड़े ईमान और बिक चुके स्वाभिमान के स्याह सच को दबाने की असफल कोशिश कर रहे पत्रकार बिरादरी को अपने गिरेबान में झाँकने की जरूरत है और मंच पर भाषण देने की बजाय आत्ममंथन की जरूरत है.(क्रमश:)
(मधेपुरा टाइम्स ब्यूरो)
पत्रकारिता का गिरता स्तर: जिम्मेवार कौन?(भाग-1) पत्रकारिता का गिरता स्तर: जिम्मेवार कौन?(भाग-1) Reviewed by मधेपुरा टाइम्स on September 16, 2012 Rating: 5

11 comments:

  1. आपने जनमानस की बात कह दी है !जब सभी रस्ते बंद हो जाते है असफल छात्र पत्रकार बनने का जुगार लगते है !

    ReplyDelete
  2. आपने जनमानस की बात कह दी है !जब सभी रस्ते बंद हो जाते है असफल छात्र पत्रकार बनने का जुगार लगते है !

    ReplyDelete
  3. amrendra kumar singhSunday, 16 September, 2012

    कुछ एसे पत्रकार को मे जनता हूँ ,जो पैसा लेकर पत्रकारिता करते है शराब पीने के लिए पत्रकारिता करते है!

    ReplyDelete
  4. जिस तरह कृष्ण ने अपने आतताई परिजनों को युद्ध मे झोंककर मरवा दिया और समाज के लिए न्याय की निस्पछ परिभाषा गढ़ी आप भी पत्रकार होकर अपने बिरादरी के खिलाफ आवाज़ उठाई इस कल्याण के लिए मधेपुरा की जनता की और से कोटि-कोटि बधाई स्वीकार कीजिये!

    ReplyDelete
  5. जिस तरह कृष्ण ने अपने आतताई परिजनों को युद्ध मे झोंककर मरवा दिया और समाज के लिए न्याय की निस्पछ परिभाषा गढ़ी आप भी पत्रकार होकर अपने बिरादरी के खिलाफ आवाज़ उठाई इस कल्याण के लिए मधेपुरा की जनता की और से कोटि-कोटि बधाई स्वीकार कीजिये!

    ReplyDelete
  6. सबसे अधिक जातिवाद पत्रकारिता मे है!एक खास वर्ग की दासी है पत्रकारिता ,समाज जिसे निस्पछ समझकर उतुस्कता के साथ पढ़ती है वह कितना पछ्पाती है भोली जनता क्या जाने?सारा का सारा दिमागी खेल है !

    ReplyDelete
  7. भारत में आज जितने भी मीडिया है उसको विदेश से फंड मिलता है और जितने भी मीडिया है वो सभी या तो ईसाई है या मुल्ले नहीं तो सेकुलर और ये सभी हमारे धर्मं ( हिन्दू ) को बदनाम करने के लिए कुछ भी कर सकता है ! आज सभी मीडिया कांग्रेस के डर से उसका चमचा बना हुआ है ! में आपको एक उदहारण दे रहा हूँ NDTV में पकंज पचोरी था कांग्रेस का चमचा बन के अभी वो P .M का मीडिया सलाहकार है ! दूसरा उदहारण देता हूँ जब गुजरात में दंगा हुआ तो सभी मीडिया वाले को याद है जबकि 1000 मुल्ला मारा था लेकिन जब 1984 में दंगा हुआ तो 3000 से ज्यादा जिन्दा सिख भाई को गले टायर डाल के आग लगा दिया लेकिन आपने कभी मीडिया को उसके बारे में हल्ला करते हुए सुना है ? आज गुजरात विकास के पथ पर है गुजरात के दूध के बिना दिल्ली के लोग चाय नहीं पी सकते ! तो आप ही बता ओ की यहाँ की मीडिया क्या हे ! मीडिया का कम आलोचना करना है किसी से डरना नहीं और न ही चमचा बनना लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सकता ? बहस के लिए मेरा नंबर है +91 9256842829 .

    ReplyDelete
  8. CHANDRASHEKHAR KUMARSunday, 16 September, 2012

    Fought for the independence of the country was the same way for the public to fight Nispc journalism!

    ReplyDelete
  9. Showing the face of a mirror to society is so ugly and disgusting blood from her body - smells like vampires!

    ReplyDelete
  10. Satyameva Jayate attend, what kind of a journalist admitted he threatened a police officer in order to get money for drinks! The program was watched by the entire country! Yellow - a journalism degree, so watch!

    ReplyDelete
  11. jol jhal sab jagah hai aur patrakar bhi isse achute nahi hain..jab hum dusre ki taraf ek ungli uthate hain toh baki ki char ungliyan khud ki ore hoti hain..

    ReplyDelete

Powered by Blogger.