28 फ़रवरी 2018

'शिक्षकों की जिम्मेदारी महती': माया विद्या निकेतन के नवनिर्मित परिसर का उद्घाटन

शिक्षा समाज-निर्माण का बीज है और विद्यालय उसकी प्रयोगशाला है। हम अपने बच्चों में शिक्षा का जैसा बीज बोएंगे, वैसा ही हमारा समाज बनेगा। यह बात प्रति कुलपति डॉ. फारूक अली ने कही। वे बुधवार को माया विद्या निकेतन के नव निर्मित परिसर के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे।


प्रति कुलपति ने कहा कि शिक्षा से ही समाज का निर्माण होता है। यदि शिक्षा अच्छी होगी, तभी अच्छे इंजिनीयर, डाक्टर, प्रशासक, राजनेता बनेंगे। अच्छे नागरिकों का निर्माण होगा और समाज एवं राष्ट्र का विकास संभव हो सकेगा। प्रति कुलपति का कहना था कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे पाने में सफल नहीं हो पा रही है। ऐसे में उसका विकल्प जरूरी है। निजी शिक्षण संस्थान उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। 

उन्होंने कहा कि मधेपुरा में निजी शिक्षण संस्थानों के लिए बेहतर अवसर है। उन्होंने माया विद्या निकेतन के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ये वीराने में फूल खिला रहे हैं। उन्होंने शिक्षकों को सलाह दी कि वे कक्षा  में बैठें नहीं और सभी बच्चों पर ध्यान दें। अभिभावकों उन्होंने कहा कि वे घर पर बच्चों के साथ समय बिताएं। बच्चों से उन्होंने आह्वान किया कि वे एक भी क्लास नहीं छोड़ें और यदि वे नियमित कक्षा करेंगे, तो ट्यूशन की जरूरत नहीं होगी।

मुख्य अतिथि सदर अनुमंडलाधिकारी संजय कुमार निराला ने माया विद्या निकेतन के नये परिसर में मौजूद सुविधाओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि नये परिसर में आने से विद्यालय का माहौल बदलेगा। यहाँ पठन-पाठन के साथ-साथ खेलकूद आदि की भी बेहtर व्यवस्था है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सभी विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलेगी और बच्चों का सर्वांगीण विकास होगा।

विशिष्ट अतिथि पूर्व कुलसचिव प्रोफेसर शचीन्द्र महतो ने कहा कि माता-पिता का यह कर्तव्य एवं धर्म है कि वे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराएं और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाएं। बच्चों को बेटा या बेटी नहीं, बल्कि एक इंसान बनाएँ।

उन्होंने कहा कि जैसे कुम्हार मिट्टी के लोदे से उपयोगी बर्तन बनाता है, वैसे ही शिक्षक बच्चों को तराश कर बेहतर नागरिक बनाते हैं। यही बच्चे आगे महावीर, बुद्ध, ईसा, मुहम्मद, मार्क्स, गाँधी एवं अंबेडकर बनते हैं। अतः शिक्षकों की महती जिम्मेदारी है। वे शिक्षण सेवा भाव से करें, इसे व्यापार नहीं बनाएं।

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