14 दिसंबर 2017

बदल रही है बीएनएमयू की फिजा: पुस्तक-लोकार्पण समारोह में बोले कुलपति

बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा सीमित संसाधनों के बावजूद प्रगति-पथ पर अग्रसर है। हमारे शिक्षक एवं विद्यार्थी सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। विगत 6 माह में यहाँ पठन-पाठन का माहौल बना है। 

यह बात कुलपति डॉ. अवध किशोर राय ने कही। वे गुरुवार को नये कैम्पस स्थित स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। मौका विभाग के अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार चौधरी की पुस्तक 'रूह की आवाज सुनो' और डॉ. सिद्धेश्वर काश्यप की पुस्तक 'लोकप्रिय हिन्दी कवि' के लोकार्पण का था। लोकार्पणकर्ता के रूप में कुलपति ने दोनों शिक्षकों को बधाई, शुभकामनाएँ एवं साधुवाद दिया। उन्होंने कहा कि दोनों पुस्तकें महत्वपूर्ण हैं। दोनों का एक ही संदेश है कि दिग्भ्रमित समाज को सही राह दिखाएं और मानवता की रक्षा करें।

कुलपति ने कहा कि बीएनएमयू के शिक्षकों एवं विद्यार्थियों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। हमारे शिक्षक एवं विद्यार्थी हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने में सक्षम हैं। यहाँ बेहतर माहौल की कमी थी, जो दूर हो गयी है। अब यहाँ की फिजा बदल रही है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में, "अब धीरे-धीरे यहाँ का मौसम बदलने लगा है।"
कुलपति ने कहा कि शिक्षकों की कमी के बावजूद हिन्दी विभाग में पठन-पाठन एवं सृजन की स्थिति सराहनीय है। यहाँ के कई विद्यार्थियों ने नेट की पात्रता भी प्राप्त की है। यह विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के लिए नजीर है। "कौन कहता है कि आसमां में सुराग नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।"

कुलपति ने सभी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों से अपील की कि वे अपनी रचनात्मकता को बढाएं। वे पठन-पाठन के अलावा सृजनात्मक लेखन में भी समय दें। उन्होंने दो माह के अंदर विद्यार्थियों की रचनाओं के पाठ हेतु कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिये। 

कुलपति ने विद्यार्थियों से अपील की कि वे अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित रहें। एकाग्रचित होकर कठिन परिश्रम करें, उन्हें अवश्य ही सफलता मिलेगी।

प्रतिकुलपति डॉ. फारूक अली ने कहा कि आज दुनिया में संकट है। समाज में संवेदनहीनता एवं  संवादहीनता बढ़ी है। ऐसे में साहित्य की भूमिका बढ़ गयी है।

प्रति कुलपति ने कहा कि युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं और मार्गदर्शकों की कमी है। साहित्य की यह जिम्मेदारी है कि वह कमी को पूरा करे। उन्होंने शिक्षकों से अपील की कि वे विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम से संबंधित पुस्तकें उपलब्ध कराएं।

इस अवसर पर सामाजिक विज्ञान संकायाध्यक्ष डॉ. शिव मुनि यादव, वाणिज्य संकायाध्यक्ष डॉ. श्री नारायण विश्वास, परिसंपदा पदाधिकारी शैलेन्द्र कुमार, पीआरओ डॉ. सुधांशु शेखर, डॉ. बैजनाथ साह, डॉ. कुलदीपक यादव, डॉ. दयाराम यादव, डॉ. भावानंद, डॉ. विमल, डॉ. प्रज्ञा प्रसाद, डॉ. शंकर कुमार मिश्र, डॉ. मनोज विद्यासागर, डॉ. आनंद आदि उपस्थित थे। अध्यक्षता डॉ. विनय कुमार चौधरी ने की। संचालन डॉ. सिद्धेश्वर काश्यप ने किया।

कविता पाठ: स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग में कविता-पाठ हुआ। इसमें तीन शिक्षक-कवियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। सहरसा से आए डाॅ. रत्नेश्वर ने मौजूदा वक्त पर अपना तंज कसा। "चंद लोगों की यही कोशिश है दोस्तों, आदमी से आदमी का फासला बना रहे। वक्त तो लगता है आखिर पत्थरों का है पहाङ, अपनी कोशिश है कि कोई रास्ता बना रहे।" मधेपुरा के डॉ. एम. आई.  रहमान ने भी तल्ख अंदाज में कहा, "रूह कांप जाती है, जब रूह आवाज देती है। अंधेरी रात का सफर कोई करके तो देखे।" उदाकिसुनगंज के डाॅ. विश्वनाथ विवेका ने राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत कविता सुनाई। "वतन की बदनसीबी का हम तकदीर लिखते हैं। शहादत सरहदों की हम तकदीर लिखते हैं।"

कार्यक्रम के आयोजन में रंगकर्मी  विकास, अन्नु, बबिता, कंचन, प्रीति, विभीषण, राजेश, पंकज, दीपक, आशीष, गीतांजली, धीरज, सुमन, किरण, पुष्पलता भारती, सुनील, राजकिशोर आदि ने सहयोग किया।

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