23 जुलाई 2017

रोहित झा: कोसी के कत्थक नर्तक की विलक्षण प्रतिभा दिला रही देश भर में ख्याति

कहते हैं कलाकार को कला ईश्वर से नैसर्गिक रूप से मिला करती है, फिर कालान्तर में उन्हें गुरू का सानिध्य प्राप्त होता है, जिनसे मिली शिक्षा, अनुशासन तथा अभ्यास के बल से वह शिष्य प्रतिभासंपन्न हो जाता है..

कोसी का मान बढ़ा रहे युवा कत्थक कलाकार रोहित झा की प्रतिभा भी ईश्वरीय देन के सदृश है जिसकी सराहना अब प्रदेश की सीमाएं लांघ रही है..

सहरसा निवासी श्रीमती पूनम झा एवम् श्री संदीप झा के तेईस वर्षीय सुपुत्र रोहित झा आजकल शास्त्रीय कलाजगत में चर्चा में हैं जो कत्थक नर्तक के रूप में अपनी पहचान बनाकर देश भर में कोसी की ख्याति फैला रहे हैं.. नृत्यकला में रोहित का बचपन से ही रूझान था और इसकी वजह से उन्होंने तरूणावस्था में इसे सीखना प्रारंभ कर दिया.. अब भी रोहित झा इस नृत्य की बारीकियों को सीखने में पूर्ण रूप से समर्पित हैं साथ ही प्रतिभासंपन्न स्कूली बच्चों को भी कत्थक सिखाते हैं.. अपनी विलक्षण प्रतिभा की ही बदौलत देशभर में आज रोहित की गिनती नवोदित कत्थक नर्तक के रूप में होने लगी है..

रोहित के घरवालों ने पढ़ा-लिखा कर इन्हें फौज में ऑफिसर बनाने का सोचा था किंतु बचपन से ही किसी शास्त्रीय धुन पर रोहित के पैर स्वत: थिरकने लगते थे.. सामान्य से परिवार में जन्मे रोहित अपने घरवालों से छुपते-छुपाते स्कूली दिनों से ही इसकी तैयारी में जुट गए.. कत्थक की शुरुआती शिक्षा में इनके मार्गदर्शक के रूप में इं साकेत झा सामने आए जिनकी पहल पर स्थानीय स्तर पर इनकी सहायता 'शशि सरोजिनी रंगमंच सेवा संस्थान, सहरसा' ने की.. फिर पटना स्थित प्रतिष्ठित कलामंच 'निनाद' में श्रीमती नीलम चौधरी व शाहिद वारसी जी, दिल्ली दूरदर्शन की ख्यातिप्राप्त कलाकार शिखा खरे जैसे गुरूओं की सरपरस्ती में इनके हुनर में निख़ार आया.. इधर अविभावक के ख़्वाहिश की पूर्त्ति के लिए रोहित ने एनसीसी ज्वाईन किया और एनसीसी कैंप के बहाने गाहे-बगाहे सहरसा से बाहर जाकर इस विधा के महारथियों से मिलकर इसकी शिक्षा लेते रहे..

प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से कत्थक नृत्य में स्नातक रोहित झा ने अपने इस छोटी उम्र में ही देश के कई प्रतिष्ठित संगीत महोत्सवों और विभिन्न स्टेज पर अपनी कला का प्रदर्शन कर तालियाँ बटोर चुके हैं.. रोहित ने स्थानीय कोसी महोत्सव से अपने प्रदर्शन की शुरूआत कर अलीगढ़ महोत्सव-उप्र, सृष्टि वर्ल्ड डांस फेस्टिवल-बंगलुरू, त्रिवेणी महोत्सव-इलाहाबाद, नटराज महोत्सव-जबलपुर, प्रयास-दिल्ली, प्रजापति उत्सव-उड़ीसा, अंतरराष्ट्रीय मोहन-रंग महोत्सव-मथुरा, सुर-संगम लोक कला मंच-दिल्ली, करूर नाट्यांजलि-तमिलनाडु, अविकोटोस ग्रीन फेस्टिवल-मुंबई, मैसूर दशहरा उत्सव-कर्नाटक, राजगीर महोत्सव-राजगीर सहित पटना दूरदर्शन तक में अपनी कला की प्रस्तुति दे चुके हैं.. कत्थक कार्यक्रम के विभिन्न मंचों पर रोहित को एकल प्रस्तुति करते देखकर कला के नामचीन हस्तियों ने भी इनकी प्रतिभा को सराहा है..

रोहित ये बताते तब अत्यंत रोमांचित हो जाते हैं जब इन्हें पद्मविभूषण पंडित बिरजू महाराज जी के द्वारा दिल्ली में स्थापित 'कला-आश्रम' में कई बार उनसे मिलने और उनकी विशाल छत्रछाया में इस कला गूढ़ गुर सीखने का मौका मिला है.. पंडित बिरजू महाराज जी ने इसके समर्पण से प्रभावित होकर प्यार से इनका नाम 'बिहारी छोरा' रख दिया है..

इन सबके अलावा इनकी रूचि तबलावादन में भी है.. तबले की चर्चा करते हुए ये कहते हैं कि तबले की 'थाप' पर ही तो पांव में थिरकन भी आती है..

आम जनमानस की सामान्य सोच के अनुसार कत्थक जैसे शास्त्रीय नृत्य में अधिकांशत: प्रयोग होने वाले मुद्रा, श्रृंगार और नज़ाकत की वजह से ये स्त्रियों के सीखने की चीज मानी जाती है.. इस कारण से शुरूआती दौर में रोहित को घर तथा बाहर वालों से भरपूर विरोध झेलना पड़ा था किंतु आज इनकी उपलब्धियों पर वही लोग गौरवान्वित महसूस करते हैं.. कभी कत्थक सीखने के लिए अनमने ढंग से अपनी स्वीकृति देने वाले रोहित झा के माँ-बाप भी तब फूले नहीं समाते जब कभी ये पुरस्कृत किए जाते हैं..

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