17 जून 2017

अब भी लालटेन युग में जी रहे लोग: एक गाँव ऐसा भी, जो हर सुविधा से है मरहूम

'तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है.'
            -अदम गोंडवी 
आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बावजूद मधेपुरा जिले के एक सड़क विहीन गाँव में लोग लालटेन युग में जीने को मजबूर हैं जो सरकारी दावों की पोल खोलता है।

मालूम हो कि मधेपुरा जिले के शंकरपुर प्रखंड के परसा पंचायत के भलुआहा एवं महाराजी गांव में सरकारी सुविधा अबतक नदारद है.

बताया गया कि इस गांव की आबादी करीब एक हजार है. गांव दोनों ओर से नदी से घिरा हुआ है. नदी पर पुल और गांव में पक्की सड़क नहीं रहने के कारण लोगों को आवागमन में काफी असुविधा होती है. वर्षा के दिनों में तो करीब सोलह किलोमीटर की दूरी तय कर लोग प्रखंड कार्यालय आते हैं.  जबकि सीधा पहुंचने की दूरी महज तीन किमी है। स्वास्थ्य केंद्र नही रहने के कारण लोगों का इलाज झोला छाप डाक्टर के भरोसे चलता है। पक्की सडक के अभाव में दरवाजे तक चार पहिया वाहन की बात तो दूर दुपहिया वाहन भी दरवाजे तक नहीं पहुँच पाता है। हाई स्कूल के अभाव में बच्चे आठवीं के बाद आगे की पढाई नही कर पाते हैं। यही नहीं, बिजली के पोल कई वर्षों  से गाड़े गए हैं, लेकिन उनके उपर अभी तक तार नही बिछाया गया है।

इस बावत वार्ड सदस्य मदन यादव, अरविन्द यादव, अनिल सिंह, सुनिल सिंह, रविन्द्र, चंदन, शंभू, रमेश, मिथिलेश, संतोष, जयकुमार यादव, विजेन्द्र यादव, सचेन कुमार, कुशुमलाल यादव, राजेश यादव आदि ने बताया कि आजादी की क्या बात करें, पंचायती राज व्यवस्था लागू होने के
17 बसंत बीत जाने के बाद भी टापूनुमा इस गांव का विकास संभव नही हो पाया। चुनाव आते ही नेताओं के द्वारा लम्बे-चौड़े वादे कर चुनाव जीतने के बाद लौटकर देखना कोई नेता मुनासिब नही समझते हैं. ना ही सरकारी आलाधिकारी की नजर इस गांव की ओर पड़ी है। वहीँ किसान हरिदेव पंडित, बहादूर पंडित, रामकिशुन पंडित, बसूल साफी, चरितर साफी, जारी देवी, उरिया देवी, मीरा देवी सहित दर्जनों किसानों ने बताया कि हमलोग सब्जी एवं उन्नत किस्म के फसल की  पैदावार करते है. लेकिन यातायात के समुचित अभाव में तैयार फसल को औने-पौने भाव में बेचना पड़ता है। गंभीर रूप से बीमार लोगों का इलाज सही समय पर नहीं हो पाता है. साधनहीन होने के कारण किसी तरह बीमार को कुमारखंड या त्रिवेणीगंज ले जाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में कभी कभी गंभीर रूप से बीमार रोगी इलाज के अभाव में रास्ते में दम तोड़ देते हैं. गाँव वालों का कहना है कि इतना ही नहीं, बेटा हो या बेटी, उनकी शादी अच्छे परिवार में नही हो पाती है, जिसके चलते हमलोगों के अरमान इस गाँव में रहकर घुट कर रह जाते हैं.

हालांकि शंकरपुर के प्रखंड विकास पदाधिकारी तेज प्रताप त्यागी ने बताया कि मुख्य सड़क से जुड़ने में गाँव की सड़क को कुछ अधिक दूरी तय करनी पड़ती है. नदी से घिरे प्रखंड के कुछ गाँवों में समस्याएं तो हैं पर पुल समेत अन्य विकास कार्य जल्द शुरू होने ही संभावना है.

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