27 मई 2017

‘रमजान का महीना है पाक-पवित्र’: रमजान कल से, जानिए सबकुछ रमजान के बारे में


मुस्लिम समाज के पवित्र महीने रमजान की शुरुआत रविवार से होगी। इस्लाम धर्म का कैलेंडर चाँद के हिसाब से चलता है। इस्लामिक महीनों में रमजान का महीना पाक-पवित्र माना जाता है।

इस्लामी कैलेंडर का 9वां महीना पवित्र रमजान का होता है। मुसलमान इस माह में भूखे-प्यासे रहकर शब्र का इम्तेहान देकर अल्लाह की इबादत करते हैं। इस महीने की पहली तारीख से मुस्लिम समाज के बीमार बच्चे को छोड़ कर सभी को रोजा रखने का हुक्म है। यह सिलसिला पूरा महीना चलता है।

अल्लाह की इबादत या ईश्वर की उपासना वैसे तो किसी भी समय की जा सकती है। उसके लिये किसी विशेष दिन की जरुरत नहीं होती लेकिन सभी धर्मों में अपने आराध्य की पूजा उपासना, व्रत उपवास के लिये कुछ विशेष त्यौहार मनाये जाते हैं। ताकि रोजमर्रा के कामों को करते हुए, घर-गृहस्थी में लीन रहते हुए बंदे को याद रहे कि यह जिंदगी उस खुदा की नेमत है, जिसे तू रोजी-रोटी के चक्कर में भुला बैठा है, चल कुछ समय उसकी इबादत के लिये समय निकाल ले ताकि खुदा का रहमोकरम तुझ पर बना रहे और आखिर समय तुझे खुदा के फरिश्ते लेने आयें और खुदा तुम्हें जन्नत बख्शें। लेकिन खुदा के करीब होने का रास्ता इतना भी आसान नहीं है खुदा भी बंदों की परीक्षा लेता है। जो उसकी कसौटी पर खरा उतरता है उसे ही खुदा की नेमत नसीब होती है। इसलिये ईस्लाम में खुदा की इबादत के लिये रमज़ान के पाक महीने को महत्व दिया जाता है। रमज़ान ऐसा विशेष महीना है जिसमें ईस्लाम में आस्था रखने वाले लोग नियमित रूप से नमाज़ अदा करते है। इस महीने बिस रेकात की नमाज और सब महीने से अधिक पढ़ी जाती है जिसे तरावीह कहते हैं।इस में हाफ़िज़े कुरान (जिसको पूरी कुरान मुजबनि याद है) नमाज के जरिये सुनते हैं।रोज़ा रखने का तरीका यह है की सूर्य उदय से लेकर सूर्यास्त तक कुछ भी ना खाना है ना पीना है। हालांकि अन्य धर्मों में भी उपवास रखे जाते हैं लेकिन ईस्लाम में रमज़ान के महीने में यह उपवास लगातार तीस दिनों तक चलते हैं।

क्या है रमजान?: इस्लाम धर्म में अच्छे इंसान को बखूबी परिभाषित किया गया है। इसके लिए मुसलमान होना ही काफी नहीं, बल्कि बुनियादी पांच कर्तव्यों को अमल में लाना आवश्यक है। पहला ईमान, दूसरा नमाज, तीसरा रोजा, चौथा हज और पांचवां जकात। इस्लाम में बताए गए इन पांच कर्तव्य इस्लाम को मानने वाले इंसान से प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा स्वतः पैदा कर देते हैं।

रमजान में रोजे को अरबी में सोम कहते हैं, जिसका मतलब है रुकना। रोजा यानी तमाम बुराइयों से परहेज करना न गलत देखना ना सुन्ना ना सोचना ना बोलना शब्र करना शामिल है यह रोज का परिभाषा है इन अमल में से कुछ भी चूक हुई तो आप का रोज नहीं होगा। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोजेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है। जब मुसलमान रोजा रखता है, उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है। रमजान में पुण्य के कामों का सबाव सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। जकात इसी महीने में अदा की जाती है। रोजा झूठ, हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसका अभ्यास यानी पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे। कुरान में अल्लाह ने फरमाया कि रोजा तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज किया है, ताकि तुम भूखो का दर्द समझो और तुझ में शब्र करने की आदत हो खुदा से डरने वाले बनो और खुदा से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर विनम्रता तथा कोमलता पैदा करे?

रमजान महीने के हैं तीन हिस्से:  रमजान के महीने को और तीन हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से में दस- दस दिन आते हैं। हर दस दिन के हिस्से को 'अशरा' कहते हैं जिसका मतलब अरबी मैं 10 है। कुरान के दूसरे पारे के आयत नंबर 183 में रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया गया है।

बाजारों में रमजान को लेकर बढ़ने लगी भीड़: बाजारों में सेहरी और अफ्तार की सामग्रियां दिखाई देने लगी हैं। सेहरी और रोजा अफ्तार के लिए कुछ अलग व्यंजन मौजूद रहते हैं। जहां लोग दूध फैनी के साथ सेहरी कर रोजे की शुरुआत करते हैं, वहीं मौसमी फल को अपनी अफ्तार के व्यंजनों में शामिल रखते हैं। अफ्तार के लिए अफजल (पवित्र) मानी जाने वाली खजूर की कई वेरायटियां भी दिखाई देने लगी हैं। इसके अलावा मौसमी फलों की बिक्री भी इस दौरान बढ़ जाएगी।

 ईद-उल-फितर: रमज़ान का महीना खत्म होने के साथ ही ईद का त्यौहार मनाया जाता है। वैसे तो दान-दक्षिणा जिसे जकात कहा जाता है रोज़े रखने के दौरान भी दी जाती है लेकिन ईद के दिन नमाज से पहले गरीबों में फितरा बांटा जाता है जिस कारण ईद को ईद-उल-फितर कहा जाता है।

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