16 अप्रैल 2017

‘पहली शर्त है-डर से स्वतंत्र होना’: चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पर चौसा में कार्यक्रम


अप्रैल 2017 को चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे हो रहे हैं। ये महात्मा गांधी का भारत में पहला सत्याग्रह था । इसी आंदोलन की याद में मधेपुरा जिले के चौसा के में कई कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है।

    कार्यक्रम के पहले चरण में सफाई अभियान चलाई गई। प्रखण्ड कार्यालय चौसा परिसर में बीडीओ मिथिलेश बिहारी वर्मा,थाना परिसर में थाना अध्यक्ष सुमन कुमार सिंह,  बाल विकास परियोजना कर्मी ,पंचायत में सभी मुखिया के नेतृत्व में सफाई अभियान कराया गया।
   बीडीओ वर्मा ने कहा कि बापू को कार्यांजलि और एक पहल जो सिर्फ सांकेतिक नहीं होगी और न ही चंपारण सत्याग्रह के 100 साल को याद करने के लिए होगी, बल्कि बापू के सपने को साकार करने के लिए सरकार और प्रभावी कदम उठाने की शुरुआत भी करेगी। सफाई और स्वच्छता को जो महात्मा गांधी के दिल से जुडे मुद्दे रहे और ये चंपारण आंदोलन के केन्द्र बिंदू भी रहे। उन्होंने कहा कि सरकार का मानना है कि इन कोशिशों से सफाई को लेकर औऱ जागरुकता बढेगी औऱ जब महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ तक जन जन तक पहुंच जाएगी। सत्याग्रह का मतलब अब स्वच्छाग्रह होगा जिसमें स्वच्छ भारत बनाने में हर व्यक्ति का योगदान होगा।
    स्वच्छ भारत अभियान को जन आंदोलन बना कर कैसे सफल बनाया जाए इस विषय पर उपस्थित जनप्रतिनिधि से चर्चा की गई। जन भागीदारी और जन आंदोलन से ही स्वच्छ भारत का सपना पूरा होगा। बीडीओ श्री वर्मा ने कहा कि गांधीजी के नेतृत्व में बिहार के चम्पारण जिले में सन् १९१७-१८ में एक सत्याग्रह हुआ। इसे चम्पारण सत्याग्रहके नाम से जाना जाता है। गांधीजी के नेतृत्व में भारत में किया गया यह पहला सत्याग्रह था।
    अंचल पदाधिकारी अजय कुमार ने कहा कि गांधीजी ने अपने कई स्वयंसेवकों को किसानों के बीच में भेजा। यहाँ किसानों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए ग्रामीण विद्यालय खोले गये। लोगों को साफ-सफाई से रहने का तरीका सिखाया गया। सारी गतिविधियाँ गांधीजी के आचरण से मेल खाती थीं। स्वयंसेवकों ले मैला ढोने, धुलाई, झाडू-बुहारी तक का काम किया। लोगों को उनके अधिकारों का ज्ञान कराया गया।चंपारण के इस ऐतिहासिक संघर्ष में डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य कृपलानी समेत चंपारण के किसानों ने अहम भूमिका निभाई।

    उन्होंने कहा कि चंपारण के इस गांधी अभियान से अंग्रेज सरकार परेशान हो उठी। सारे भारत का ध्यान अब चंपारन पर था। सरकार ने मजबूर होकर एक जाँच आयोग नियुक्त किया, गांधीजी को भी इसका सदस्य बनाया गया। परिणाम सामने था। कानून बनाकर सभी गलत प्रथाओं को समाप्त कर दिया गया। जमींदार के लाभ के लिए नील की खेती करने वाले किसान अब अपने जमीन के मालिक बने। गांधीजी ने भारत में सत्याग्रह की पहली विजय का शंख फूँका। चम्पारन ही भारत में सत्याग्रह की जन्म स्थली बना।
     थाना परिसर में आयोजित कार्यक्रम में गांधी जी के चंपारण आंदोलन पर चर्चा  करते हुए थाना अध्यक्ष सुमन कुमार सिंह ने कहा कि हजारों भूमिहीन मजदूर एवं गरीब किसान खाद्यान के बजायनील और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिये वाध्य हो गये थे। वहाँ पर नील की खेती करने वाले किसानों पर बहुत अत्याचार हो रहा था। अंग्रेजों की ओर से खूब शोषण हो रहा था। ऊपर से कुछ बगान मालिक भी जुल्म ढा रहे थे। गांधीजी स्थिति का जायजा लेने वहाँ पहुँचे। उनके दर्शन के लिए हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। किसानों ने अपनी सारी समस्याएँ बताईं। उधर पुलिस भी हरकत में आ गई। पुलिस सुपरिटेंडंट ने गांधीजी को जिला छोड़ने का आदेश दिया। गांधीजी ने आदेश मानने से इंकार कर दिया। अगले दिन गांधीजी को कोर्ट में हाजिर होना था। हजारों किसानों की भीड़ कोर्ट के बाहर जमा थी। गांधीजी के समर्थन में नारे लगाये जा रहे थे। हालात की गंभीरता को देखते हुए मेजिस्ट्रेट ने बिना जमानत के गांधीजी को छोड़ने का आदेश दिया। लेकिन गांधीजी ने कानून के अनुसार सजा की माँग की। फैसला स्थगित कर दिया गया। इसके बाद गांधीजी फिर अपने कार्य पर निकल पड़े। अब उनका पहला उद्देश लोगों को 'सत्याग्रह' के मूल सिद्धातों से परिचय कराना था। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्त करने की पहली शर्त है - डर से स्वतंत्र होना।

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