15 फ़रवरी 2017

शराबबंदी मामले में गम्हरिया थानाध्यक्ष ने कानून का बनाया मजाक, कोर्ट से नोटिश

एक तरफ शराबबंदी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जहाँ गंभीर हैं वहीँ मधेपुरा जिले के कुछ अधिकारियों की कार्यशैली इस मामले में न सिर्फ विवादस्पद है बल्कि कानून की धज्जियाँ उड़ाने वाली भी.

    मधेपुरा जिले के गम्हरिया थानाध्यक्ष मुकेश कुमार मुकेश और उत्पाद अधीक्षक मधेपुरा पर संगीन आरोप लगे हैं और एक मामले में मधेपुरा की अदालत ने क़ानून के द्वारा प्रदत्त शक्ति का दुरूपयोग करने के लिए दोनों अधिकारियों से बिन्दुवार स्पष्टीकरण की मांग की है.
    मिली जानकारी के अनुसार मामला 30 दिसंबर 2016 से जुड़ा है जब गम्हरिया में पुलिस ने 48 पेटी शराब बरामद की और प्रत्येक पेटी में 12 बोतल शराब थी. सुपौल निवासी ऑटो चालक छोटू सहनी कोई कागज़ प्रस्तुत नहीं कर सका. कहा जा रहा है कि इसकी सूचना मधेपुरा के उत्पाद विभाग को दी गई और उत्पाद विभाग के अधिकारी 4-4 बोतल जांच ले लिए अपने साथ ले गए. उत्पाद अधीक्षक के कार्यालय के पत्रांक संख्यां 45 दिनांक 18 जनवरी 2017 के द्वारा जनच प्रतिवेदन गम्हरिया पुलिस को सौंप दी गई जिसके अनुसार सैम्पल में ईथायल अल्कोहल की 0.9 f u/v मात्रा पाई गई जबकि राज्य में पूर्ण शराबबंदी के बाद 0.1 f u/v से अधिक की मात्रा होने पर ये अपराध की श्रेणी में अत है.
    अब जानिये कि कानून की धज्जी कैसे उड़ाई गई है. गम्हरिया थानाध्यक्ष ने ऑटो ड्राइवर (ऑटो नं. BR 50 G 2969) के ड्रायवर को P/R बांड पर ही छोड़ दिया और मामले में तत्काल एफआईआर तक दर्ज नहीं की. बताया गया कि 30 दिसंबर 2016 की घटना की प्राथमिकी इस 4 फरवरी को दर्ज की गई है. मामले को मधेपुरा के एसीजेएम सुनील कुमार सिंह की अदालत ने  अत्यंत गंभीर मानते हुए इसे कानून के द्वारा मिली शक्ति के दुरूपयोग की श्रेणी में रखा है और दोनों अधिकारियों से कुल 6 बिन्दुओं पर एक सप्ताह के अन्दर जवाब माँगा है.
    भारतीय कानून की दंड प्रक्रिया संहिता के नियमों के अनुसार ऐसी घटना के तुरंत बाद अल्कोहल सीज करने के समय प्राथमिकी दर्ज करना नितांत आवश्यक है और प्राथमिकी भी 24 घंटे के अन्दर कोर्ट में समर्पित किया जाना चाहिए. एक संगीन मामले, जिसमें अभियुक्त को कोर्ट से भी आसानी से जमानत नहीं मिलती है, उसमें पीआर बांड पर किसी को छोड़ देना और इतने लम्बे समय तक क़ानून को अपनी जेब में रखना अत्यंत गंभीर मामला है.
    अब ये मामला कर्ट के पाले में हैं और ये बात तय है क़ि थानाध्यक्ष समेत उत्पाद अधिकारी का इतने गंभीर मामले में आसानी से निकलना काफी मुश्किल हो सकता है.

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