24 नवंबर 2016

विश्व शाकाहारी दिवस के रूप में मनेगी साधु वासवानी की जयंती, मधेपुरा में कार्यक्रम

भारत के महान संत, शिक्षाविद और स्वतंत्रता सेनानी साधू वासवानी की 137वीं जयंती मधेपुरा में फिर धूमधाम से मनाई जा रही है. इस अवसर पर कल 25 नवम्बर को विश्व शाकाहार दिवसके रूप में मनाया जाएगा. 
आज साधू वासवानी की जयंती के एक दिन पूर्व मधेपुरा में एक शांति यात्रा निकाली गई. शांति यात्रा से पूर्व कार्यक्रम का उद्घाटन जिला मुख्यालय के स्टेट बैंक रोड स्थित साधू वासवानी केंद्र पर स्थानीय तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया. शांति यात्रा में तुलसी पब्लिक स्कूल के बच्चों, शिक्षक वरुण कुमार के अलावे सरोज अग्रवाल, संजू, नेहा, निर्मल सुल्तानिया, किरण सपना निशा सहेली  मोहन मन्नू शालू समेत साधू वासवानी के अनुयायियों ने भी बड़ी संख्यां में भाग लिया.

जानें कौन थे साधू वासवानी?: साधु वासवानी का जन्म हैदराबाद में 25 नवम्बर 1879 में हुआ था. उन्होने कलकत्ता कॉलेज में प्रवक्ता के रूप में काम किया और उसके बाद स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. उन्होने कई पुस्तकों की भी रचना की. उनका बचपन का नाम थांवरदास लीलाराम रखा गया. सांसारिक जगत में उन्हें टी.एल.वासवानी के नाम से जाना गया तो अध्यात्मिक लोगों ने उन्हें साधु वासवानी के नाम से सम्बोधित किया. साधु वासवानी ने जीव हत्या बंद करने के लिए जीवन पर्यन्त प्रयास किया. वह समस्त जीवों को एक मानते थे. उन्होंने वर्ष 1902 में एम.ए.की उपाधि प्राप्त करके विभिन्न कॉलेजों में अध्यापन का कार्य किया. वह टी.जी.कॉलेज में प्रोड्डेसर नियुक्त किए गए. लाहौर के दयाल सिंह कॉलेज, कूच बिहार के विक्टोरिया कॉलेज और कलकत्ता के मेट्रोपोलिटन कॉलेज में पढ़ाने के पश्चात 1916 में पटियाला के महेन्द्र कॉलेज के प्राचार्य बने. वह सभी धर्मों को एक समान मानते थे. उनका कहना था कि प्रत्येक धर्म की अपनी अपनी विषेशताएं हैं. वह धार्मिक एकता के प्रबल समर्थक थे.
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वर्ष की आयु में वासवानी भारत के प्रतिनिधि के रूप में विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए बर्लिन गए. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी साधू वासवानी का महत्वपूर्ण योगदान रहा. बंगाल के विभाजन के मामले पर उन्होंने सत्याग्रह में भाग ले कर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया. बाद में भारत की स्वतंत्रता के लिए चलाए जा रहे आन्दोलनों में उन्होंने बढ़ चढ़ कर भाग लिया. वह गांधी की अहिंसा के बहुत बड़े प्रशंसक थे. उन्हें महात्मा गांधी के साथ मिल कर स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने का अवसर मिला. वह किसानों के हितों के रक्षक थे. उनका मत था कि भूमिहीनों को भूमि दे कर उन्हें आधुनिक तरीके से खेती करने के तरीके बताए जाने चाहिए. (साभार: विकीपीडिया)

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