19 अक्तूबर 2016

व्हाट्सअप तथा फेसबुक ग्रुप पर जिला प्रशासन के आदेश पर सोशल मीडिया पर जमकर विरोध

कल जारी जिला प्रशासन के संयुक्त आदेश जिसमें कहा गया था कि मधेपुरा के सामान्य नागरिकों के द्वारा बनाये जाने वाले प्रत्येक व्हाट्सअप ग्रुप में जिला स्तरीय मॉनिटरिंग कोषांग का मोबाइल नं. 9955948775 को अनिवार्य रूप से जोड़ा जाएगा, वर्ना उनपर कड़ी कार्रवाई की जायेगी और
इसी प्रकार से जिले के सभी फेसबुक ग्रुप को भी Madhepura Monitor को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजकर उसे ग्रुप से जोड़ना होगा पर आदेश जारी होने के बाद से ही सोशल मीडिया पर जिला प्रशासन के विरोध में तीखी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो चुका है.
हजारों यूजर्स ने इस आदेश का विरोध किया है. हालाँकि इस बीच आज मधेपुरा जिला प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया कि इस परिधि में सभी ग्रुप नहीं आयेंगे.
क्या कहा सोशल मीडिया यूजर्स ने?: कल के आदेश के बाद व्हाट्सअप और फेसबुक पर जारी विरोध में कई सोशल मीडिया के जाने माने यूजर्स ने जिलाधिकारी के आदेश को तुगलकी फरमान की संज्ञा दी थी. समिधा ग्रुप में एक बैठक कर यूजर्स ने आदेश के खिलाफ विरोध दर्ज कर इसे वापस लेनेकी मांग की है.
फेसबुक पर अपने पोस्ट में दैनिक जागरण के पत्रकार राकेश रंजन ने लिखा है कि मधेपुरा जिला प्रशासन का तुगलकी आदेश. सोशल मीडिया में अब तक ऐसा प्रशासनिक दखल मैंने देखा है और सुना है. जिले में चल रहे सभी व्हाट्सएप ग्रुप में जिला प्रशासन का एक नंबर ऐड करना ही पड़ेगा. ऐसा नही करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की बात कही गयी है. यह आमलोगों की निजता का सीधा उल्लंघन है. ऐसा अगर किया गया तो आमलोगों के निजी जिंदगी में जिला प्रशासन का यह सीधा तांक झांक होगा. संदीप शांडिल्य लिखते हैं कि निश्चित ही मधेपुरा जिलाधिकारी ने समाजहित मे काम कर रहे हैं मगर फेसबुक ग्रुप और व्हाट्सएप्प ग्रुप मे उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी का नंबर उस ग्रुप मे जोड़ने का फरमान असंवैधानिक और बिना किसी मतलब का है. अगर प्रशासन सच मे सोशल मिडिया पर अवान्छित पोस्ट को कण्ट्रोल चाहती हैं तो बस और बस एक उपाय हैं: बड़े बड़े ग्रुप, फेसबुक ग्रुप के एडमिन की बैठक करवानी होगी और उनसे रिक्वेस्ट करना होगा कि ऐसे असामाजिक तत्वों की जानकारी आपको सीधे दे. 
सांसद पप्पू यादव ने भी खोला मोर्चा: उधर कल के जिलाधिकारी के आदेश पर जन अधिकार पार्टी (लो) के संरक्षक मधेपुरा के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने कहा है कि वे जेल जाने को तैयार हैं, पर मधेपुरा के डीएम के तुगलकी फरमान को नहीं मानेंगे उन्होंने मधेपुरा के लोगों का आह्वान किया कि वे डीएम के आदेश से नहीं डरें. अपने फेसबुक/वाट्सएप ग्रुप की जानकारी प्रशासन को बिलकुल नहीं दें. प्रशासन कोई कार्रवाई करता है, तो साथ में वे लड़ने को तैयार होंगे. साथ में, इसका ख्याल जरुर रखें कि उनके माध्यम से कोई अफवाह फैले. समाज की शांति सबसे महत्वपूर्ण है. सांसद ने कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि मधेपुरा के डीएम को संविधान का ठीक से पता नहीं है. वरना, इस तरह से वे आम आदमी की निजता के अधिकार पर हमला नहीं बोलते.
प्रशासन का पक्ष: हालांकि इस बीच आज जिला प्रशासन की ओर से जारी एक आदेश में कहा गया है कि इस परिधि में मात्र वैसे ग्रुप आते हैं जो सोशल ग्रुप के अधीन परिभाषित किये जायेंगे. पारिवारिक ग्रुप या प्रेस ग्रुप इस परिधि के अधीन नहीं माने जायेंगे. आदेश में आगे लिखा है कि इस प्रकार का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (2) एवं 19 (3) के अधीन भारत की एकता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा एवं पब्लिक ऑर्डर को बनाये रखने के निमित्त निर्गत किया गया है.

कहते हैं एक्सपर्ट: जबकि एशियन स्कूल ऑफ सायबर लॉ, पुणे से सायबर लॉ की डिग्री हासिल कर चुके राकेश सिंह कहते हैं कि जहाँ तक भारतीय संविधान, भारतीय दंड संहिता और आईटी एक्ट की बात है तो ऐसे कानून सामान्य परिस्थिति में शायद ही बनाये जा सकें. सामान्य परिस्थिति में इंटरनेट पर लगाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी उल्लंघन है, जो हमें संविधान से प्रदत्त है. इस सम्बन्ध में  माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने Writ Petition (Criminal) 167/2012 (श्रेया सिंघल बनाम युनियन ऑफ इंडिया) तथा इसके साथ दाखिल 9 अलग-अलग रिट पिटीशन पर 24 मार्च 2015 पर आदेश पारित करते हुए आईटी एक्ट की एक बड़ी धारा 66A तक को असंवैधानिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से सम्बंधित भारतीय संविधान की धारा 19(1) (a) और 19 (2) का उल्लंघन मानते हुए हटाने का आदेश दे दिया था. बता दें कि इन्फोर्मेशन एक्ट 2000 की धारा 66A में लिखा था कि Any person who sends, by means of a computer resource or a communication device,—(a) any information that is grossly offensive or has menacing character; or which he knows to be false, but for the purpose of causing annoyance, inconvenience, danger, obstruction, insult, injury, criminal intimidation, enmity, hatred or ill will, persistently by making use of such computer resource or a communication device.'
        आईटी एक्ट की धारा 66A अत्यंत महत्वपूर्ण धारा थी और उसे हटाना सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहने वालों की बड़ी जीत थी. जाहिर है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारा संवैधानिक अधिकार है. हालाँकि अपमानजनक टिप्पणियों के लिए कुछ परिस्थितियों में आईपीसी की धारा लगाई जा सकती है.
            अब देखना है कि प्रशासन द्वारा स्थिति स्पष्ट करने के बाद इसे किस तरह से लागू कराया जायेगा और मधेपुरा के सोशल मीडिया यूजर्स इसे किस तरह से लेते हैं.

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